बस यूँ ही सारे काफ़िये, रदीफ़, छंद,बहर, मीटर-पैरामीटर को दर-किनार रखते हुए....
कुछ अपनी कहो कुछ अपनी कहें
कुछ अपनी कहो कुछ अपनी कहें
यादों के मरुस्थल में रेत से बहें
बुरा क्या हो गर ये रिश्ता बना लें
मेरे ख़याल सारे ज़हन में तेरे रहें
बिछ गई चादर बर्फ की चलो अब
कुछ गुनगुनी हो जाये धूप से कहें
समझौते फ़ितरत बन गए उसकी
कहता था अक्सर कि कब तक सहें
