हमारे पास लौट कर क्या आता है ? कुछ भी तो नहीं. सब छूटता जा रहा है पल, घड़ी दिवस और सब कुछ. हम सफ़र के आगाज़ में कितने खुश थे कि गिरते पड़ते हुए भी लकड़ी के तिपहिये को नहीं छोड़ते थे. हर बार उसी पर गिरते और उसी के सहारे उठ खड़े होते थे. तिपहिये टूट गए और वे पीछा करते हुए साये भी नहीं रहे जो अक्सर गिरने से पहले उठा लिया करते...
दीवारें धुंधली हो गई हैं. मैं अपने घर को वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसा पिता सौंप कर गए थे कि इससे मेरी माँ को यकीन होता है कि उनका ही तामीर किया हुआ है. ऐसे ही कई बीते हुए दिनों की शामों की पदचाप मेरी स्मृतियों में जागती है तो ज़िन्दगी के टुकड़े बीस साल के हिसाब से करने शुरू करता हूँ. इस दूसरे टुकड़े के अवसान के समय जाने ऐसा क्यों लगता है कि कुछ लौट कर आता है.... जैसे इकराम अजमेरी की इन दो कविताओं को पढ़िए
अंत में
मैं तुम्हें लिखना चाहता था
मौसम के बारे में
कि अप्रेल के आखिर से ही
गर्मी बहुत बढ़ गयी है
लेकिन गर्मी का बढ़ जाना
कोई ऐतिहासिक घटना नहीं है
इसलिए मैंने
इसे लिखने का विचार छोड़ दिया है
फिर मैं तुम्हें अपनी इच्छाओं के बारे में बताना चाहता था
और अपनी इच्छाओं को सुनने वाला पहला श्रोता बनाना चाहता था
लेकिन जब मैंने उन्हें सुनाने की तैयारिया की
और उनके सार को तलाशा
तो मुझे मालूम हुआ कि
मेरी इच्छाएं भी सामान्यतया कोई आकर्षण नहीं जगाती है
इस विचार को भी मैंने छोड़ दिया है.
स्मृति
तब से चला वेताल
अब पहुँच गया निर्जन में
जिसकी तिथियाँ अनचीन्ही है
दिग्भ्रमित हो गया समस्त चिंतन
लील रहा है खुद को
और दसों दिशाओं से जल, थल नभ को भी
कि किस काशी को चले थे
और कहाँ पहुँच गए हम
अब कैसे कहाँ जाएंगे हम ?