Sunday, May 2, 2010

चाय री थडी अर चिंतन

(प्रस्तुत आलेख २३ अप्रैल २०१० को नवभारत टाइम्स के मुंबई संस्करण में किंचित परिवर्तनों के साथ प्रकाशित)

कैवण री बात कोनी कै अठे बत्ती गर्मी पड़ण लागगी है. सैन होवण सूं बार रो मामलो हो रयो है.इण बिच्चे लारले दो दिनां सूं आंधी चाल री है.ऊपर सूं तो गर्मी बरसतोड़ी नी दिखे पर जमीन सूं झाळ वैड़ी री वैड़ी है. डूबतोड़े सूरज ने आज मैं आंधी रै माँय देखियो. धूडै सूं भरिज्योड़ो. शैतान बच्चे रे ज्यूं कैव्तो के अबार तो जावण रो टैम है, काल पाछो आ'र बताऊंला, इण सूं बत्ती गर्मी ले'र आउंला. मारवाड़ में इण मौसम में गर्मी री कईं बात करणी. अठै जोधपुर में प्रसासन एक काम चोखो करयो. स्‍कूलां में टाबरां रै जल्दी छुट्टी रा आदेश जारी कर दीना.कई ठा डर भी हो सकै कै कठै तबीयत दूजी ख़राब होयगी तो जवाब देणो भरी पड़ जावैला.
स्कूलां सूं याद आयो कै थारी भतीजी रो एडमीसन चोखी भणाई- पढाई वाळी स्कूल में होय ग्यो है. मन्‍नै सब बधाई अर थारी भतीजी ने आसीस दे रिया है. स्कूल में हिंदी पढावण वाळा बैन्जी जद निप वाळो पैन लावन रो आदेस फरमायो तो मैं बौत राजी व्हियो.मारै बाळपणै री याद ताजी होयगी. काइ चालतो वा पैन ! माखण वै ज्यूं. राइटिंग जोरदार जमती.आ बात दूजी है कै कंप्‍यूटर माथै लिखण रै जमाने में आज राइटिंग नै कुण पूछै. खैर थूं सुणा. कीकर चाल री है गाडी?

घणा टैम पछै एकर जालोरी गेट वाळी चाय री थडी याद आई.कई जमानो हो जद लोग चला'र आपरी पसंद वाळै कनै चाय पीवण जावता.कीं खास दुकानां माथै चाय री भगौली चडीयोड़ी'ज रैवती.लोग कठै रा कठै सूं आवता.जद उण दिनां री याद आइ तो मैं निरे टैम पछे चाय रो मूड उठै जा अर पीवण रो बणायो. मिनखां ने ले जावती गाडियां री भीड़ सूं बच-बचावतो उठै पुगो तो काईं देखूं कै थडी तो उठै'ज है पर आदमी दूजो बैठो है. मैं उन्‍नै पूछियो के पैली वाला भाई साब कठै ? तो जवाब आयो कै भाई साब पागथी जूस रो काम संभाळै. मतलब कै भाई साब सेठ बण ग्‍या है. चोखो भई चोखो, नीतर चाय री थडीयां ने ऊठते टैम नी लागे. जगै जगै मॉल बण रया है. माल सूं ठसा ठस भरियोडा. कई ठा इत्तो माल किण रै वास्ते राखै. रोजीना नवो नवो माल दिखे. दूजी कानै किराणा रा छोटा दुकानदार अखबार हाथ में लेर पंखो झलता इज दिखे.टैम इज टैम लागै वांरे कनै.

मैं समझ सकूं के परदेस माँय आपरी मायड़ भासा में पढ़ण रो कईं आनंद होया करै.मां बोलती सुणीजै ज्यूं. थन्नै जाण अर अचरज होवैला कै अबार एक जलसे में अठै रा लूंठा साहित्यकार डा.आइदान सिंह भाटी री हिंदी कवितावां में राजस्थानी रा ठेठ सब्‍दां माथै सवाल खडा होय ग्‍या.भाटी जी कयो कै जद हिंदी में भोजपुरी या कै खड़ी बोली रा सब्‍दां माथै कदी सवाल नी हुआ तो राजस्थानी रो प्रयोग क्यूं अखरै? अर दुनिया रा महान साहित्यकारां आपरी मायड़ बोली री महिमा करी है तो हाल ताई इण तरै रा सवाल क्यूं उठै ?मूमल नै आप खड़ी बोली में सुण'र वैड़ो आनंद ले सको? पाबूजी री पड़ भोजपुरी में बांच सको? अठै भासा रो सवाल इज सई नी है.बात किण री नै कठे री हो रई है वा जरूरी है.सब्द तो यूँ भी रमता जोगी हुआ करै. कठै कठै सूं आ अर बिराज जावै. आ अर भासा संस्कृति रा वाहक हुआ करै.
बात भी ठीक है.वडा पाव में लांबी मिर्च घुसा अर उन्नै मिर्ची बड़ो कै सकां? जठैरी बात होय री है वठै रा सब्द इज ओपै. अर जै मारी बात थने ओपती लागै तो याद करतो रईजै. मैं जाणू थारे कनै टैम रो टोटो है.सब जगा आईज हाल है. अबै करां राम राम.