आज आप तक पहले अंक की एक कविता पहुंचा रहा हूँ. इसे उन दिनों के मुम्बई विश्वविध्यालय के छात्र विजय ने लिखा है. मेरे मित्र अमित, मुम्बई से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रहे थे और विजय से उन्ही की जानकारी थी. "विजय अकेला" की और पहचान बताने का तरीका मुझे ख़ास अच्छा नहीं लग रहा फिर भी "कहो ना प्यार है" फिल्म में एक उन्हीं का लिखा हुआ गीत है. एक पल का जीना फिर तो है जाना... उस गीत को सुनता हूँ और विजय की इस कविता को पढ़ता हूँ तो लगता है कि सिर्फ मैं ही नहीं हर कोई बीस साल बाद कहीं न कहीं भटक ही जाया करता है. अब विजय साहब क्या करते होंगे इससे अनजान हूँ, लेकिन उन दिनों मुम्बई विश्व विद्यालय के भाषा प्रभाग के हॉस्टल के कमरों में दरवाजे खटखटाया करते थे और विल्स नेवी कट सिगरेट खोजा करते थे. आईये उनकी कविता पढ़ें जो उन्होंने बाईस साल की उम्र में लिखी थी.
अब कोई आवाज़ नहीं उठाता
अब कोई आवाज़ नहीं उठाता
हर तरफ एक गहरी
ख़ामोशी सी छाई है
सब के मन में व्याप्त है
एक अज्ञात किस्म का
जाना पहचाना खौफ
कोई नहीं पड़ना चाहता
अब समाज को बदल डालने के पचड़े में
फटे कुरते और टूटी चप्पलों की
कल्पना से ही सिहर उठता है
अब लोगों का मन.
अपना बहुत कुछ खोने
और सडकों पर सोने की संभावनाओं से ही
मन उदास हो उठता है
लगता है
जैसे लोगों का मोह भंग हो चुका है
और व्यवस्था को ही
नियति माना जा चुका है.
कहीं गहरे तक जैसे
पैठ चुकी है ये बातें
लोगों के मन में कि
समाज को कभी बदला ही नहीं जा सकता
बुराई कभी ख़त्म ही नहीं की जा सकती
मगर हाँ ... एक बात जरूर है
बिखरी हुई सामाजिक परिस्थितियों की
गिरते हुए मानवीय मूल्यों की
शक और साजिश भरे माहौल से उबरने की चर्चा
दबी और सहमी जबान से
हर कोई करता है, खूब करता है.
लोग महसूस करते हैं
गहरे तक इस फिजा को, इस माहौल को
मगर चर्चाओं से क्या होता है
हर चर्चा हर बहस अधूरी रह जाती है
निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाती
कहीं ना कहीं से लोग
अपने आप को
बचा लेने की प्रवृति पाल लेते हैं.
बातें,
उसी स्तर तक चाहते है करना
जिसके व्यवहारिक रूप को
अंजाम कम ही देना पड़े.
वैसे हर कोई जानता है
इस बदशक्ल दुनिया का इलाज
इस घुटन भरे माहौल और
इस नाकाबिले बर्दाश्त
तंग ज़िन्दगी का इलाज,
मगर कहा ना लोग नंगे हो चुके हैं.
सामने वाला जब से नंगा दीखने लगा है
शर्म आनी बंद हो गयी है
जैसे नंगों की नंगों से दोस्ती हो गयी है .
अब तो सब के
खाने और दिखाने वाले दांत भी
स्पष्ट नज़र आने लगे हैं
तभी तो आज वो कशिश, वो जोश, वो प्रेरणा
नहीं प्राप्त हो पाती
कवियों और कथाकारों की रचनाओं से
आम आदमी ना जागरूक हो पाता है
ना ही कोई कदम उठा पाता है
ना ही कोई आवाज़ उठाता है.
सब जैसे इंतजार में हैं
कोई अवतार, मसीहा, पैगम्बर या गुरु आएगा
और सब बदल कर चला जायेगा
साथियों मगर मैं कहता हूँ
वैसा कोई नहीं आएगा
हमें ही ईमानदारी, सच और संघर्ष से भरा
धनुष और बाण उठाना होगा
बनना होगा आज का अर्जुन .
कुल मिलाजुला कर
यही खतरनाक और गंभीर स्थितियां है
क्या लोगों की तरह आप भी खामोश बैठे रहेंगे
या बेचैन हो रही मानवीय भावनाओं के लिए
एक आवाज़ उठाएंगे
जवाब दीजिये मैं आप ही से पूछ रहा हूँ
जी हाँ सिर्फ आप से ...