Friday, January 29, 2010

अब कोई आवाज़ नहीं उठाता... बीस साल बाद और भी बुरा हाल है

मेरे लिए साल उन्नीस सौ बानवे कुछ ख़ास किस्म का था. हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर के पूर्वार्द्ध में प्रवेश ले कर जोधपुर विश्वविध्यालय के न्यू केम्पस के हॉस्टल में कमरा संख्या ३१५ में रहा करता था. नवभारत टाईम्स के कार्यालय में शाम के तीन घंटे बिताने के अतिरिक्त कुछ विशेष यादें जो साथ है, उनमे एक "प्रतिबद्ध" नामक छात्रों का साहित्यिक परचा प्रमुख है. रज़िया बेग़म, मनोज चौधरी और राकेश शर्मा के साथ मिल कर इसका प्रकाशन किया जाता था. एक पेज को लेजर टाइप करवाने के बीस रुपये और फिर दो सौ पन्नों की फोटो स्टेट करवाना... चार पन्नों की हमारी पत्रिका यानि तीन सौ अस्सी रुपये के खर्च में एक महीने का प्रकाशन हो पाता था. इस पत्रिका को हम जोधपुर विश्व विद्यालय के अतिरिक्त बीकानेर, उदयपुर और कुछ अन्य विश्व विद्यालय केपरिचित छात्रों को भी भेजा करते थे. उस बुक पोस्ट का पैसा भी जुटाना एक दुष्कर कार्य था. हर तीसरे महीने के कुछ दिन आर्थिक प्रबंधन में लग जाया करते. उन दिनों के कुछ अंक मेरी फाइल में अब भी मुस्कुराते हैं. वे दिन सच में दुनिया को सुंदर बनाने के ख़्वाबों वाले दिन थे.

आज आप तक पहले अंक की एक कविता पहुंचा रहा हूँ. इसे उन दिनों के मुम्बई विश्वविध्यालय के छात्र विजय ने लिखा है. मेरे मित्र अमित, मुम्बई से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर कर रहे थे और विजय से उन्ही की जानकारी थी. "विजय अकेला" की और पहचान बताने का तरीका मुझे ख़ास अच्छा नहीं लग रहा फिर भी "कहो ना प्यार है" फिल्म में एक उन्हीं का लिखा हुआ गीत है. एक पल का जीना फिर तो है जाना... उस गीत को सुनता हूँ और विजय की इस कविता को पढ़ता हूँ तो लगता है कि सिर्फ मैं ही नहीं हर कोई बीस साल बाद कहीं न कहीं भटक ही जाया करता है. अब विजय साहब क्या करते होंगे इससे अनजान हूँ, लेकिन उन दिनों मुम्बई विश्व विद्यालय के भाषा प्रभाग के हॉस्टल के कमरों में दरवाजे खटखटाया करते थे और विल्स नेवी कट सिगरेट खोजा करते थे. आईये उनकी कविता पढ़ें जो उन्होंने बाईस साल की उम्र में लिखी थी.

अब कोई आवाज़ नहीं उठाता

अब कोई आवाज़ नहीं उठाता
हर तरफ एक गहरी
ख़ामोशी सी छाई है
सब के मन में व्याप्त है
एक अज्ञात किस्म का
जाना पहचाना खौफ
कोई नहीं पड़ना चाहता
अब समाज को बदल डालने के पचड़े में
फटे कुरते और टूटी चप्पलों की
कल्पना से ही सिहर उठता है
अब लोगों का मन.

अपना बहुत कुछ खोने
और सडकों पर सोने की संभावनाओं से ही
मन उदास हो उठता है
लगता है
जैसे लोगों का मोह भंग हो चुका है
और व्यवस्था को ही
नियति माना जा चुका है.

कहीं गहरे तक जैसे
पैठ चुकी है ये बातें
लोगों के मन में कि
समाज को कभी बदला ही नहीं जा सकता
बुराई कभी ख़त्म ही नहीं की जा सकती

मगर हाँ ... एक बात जरूर है
बिखरी हुई सामाजिक परिस्थितियों की
गिरते हुए मानवीय मूल्यों की
शक और साजिश भरे माहौल से उबरने की चर्चा
दबी और सहमी जबान से
हर कोई करता है, खूब करता है.

लोग महसूस करते हैं
गहरे तक इस फिजा को, इस माहौल को
मगर चर्चाओं से क्या होता है
हर चर्चा हर बहस अधूरी रह जाती है
निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाती
कहीं ना कहीं से लोग
अपने आप को
बचा लेने की प्रवृति पाल लेते हैं.
बातें,
उसी स्तर तक चाहते है करना
जिसके व्यवहारिक रूप को
अंजाम कम ही देना पड़े.

वैसे हर कोई जानता है
इस बदशक्ल दुनिया का इलाज
इस घुटन भरे माहौल और
इस नाकाबिले बर्दाश्त
तंग ज़िन्दगी का इलाज,
मगर कहा ना लोग नंगे हो चुके हैं.
सामने वाला जब से नंगा दीखने लगा है
शर्म आनी बंद हो गयी है
जैसे नंगों की नंगों से दोस्ती हो गयी है .

अब तो सब के
खाने और दिखाने वाले दांत भी
स्पष्ट नज़र आने लगे हैं
तभी तो आज वो कशिश, वो जोश, वो प्रेरणा
नहीं प्राप्त हो पाती
कवियों और कथाकारों की रचनाओं से
आम आदमी ना जागरूक हो पाता है
ना ही कोई कदम उठा पाता है
ना ही कोई आवाज़ उठाता है.

सब जैसे इंतजार में हैं
कोई अवतार, मसीहा, पैगम्बर या गुरु आएगा
और सब बदल कर चला जायेगा
साथियों मगर मैं कहता हूँ
वैसा कोई नहीं आएगा
हमें ही ईमानदारी, सच और संघर्ष से भरा
धनुष और बाण उठाना होगा
बनना होगा आज का अर्जुन .

कुल मिलाजुला कर
यही खतरनाक और गंभीर स्थितियां है
क्या लोगों की तरह आप भी खामोश बैठे रहेंगे
या बेचैन हो रही मानवीय भावनाओं के लिए
एक आवाज़ उठाएंगे
जवाब दीजिये मैं आप ही से पूछ रहा हूँ
जी हाँ सिर्फ आप से ...

Sunday, January 24, 2010

इस वसंत, इकराम की चार कविताएं

अमंगलकारी तत्वों के विनाश की कामना है - कविता, विषय पर गौतम राजरिशी जी का आग्रह था कि इस बहस को खुला रखा जाये. सच है कि उनके मन में इस बहस को आगे बढाने के सदविचार रहे होंगे किन्तु वे इकराम जी की कविता से प्रभावित हुए और इसी पर अपनी प्रतिक्रिया दे पाए. कुछ अलग तरह की व्यस्तताएं हैं कि मैं कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ फिर भी इकराम की तरह मेरे भीतर भी इक मुकम्मल सपना हर रोज़ खिलता है कि लिखना जारी रहेगा और इसे अगली पोस्ट में लिखने की कोशिश करूँगा.
आज आपके लिए प्रस्तुत है इकराम की कुछ कविताएं. इन कविताओं का प्रसारण १ फरवरी १९९२ को उदयपुर आकाशवाणी से हुआ था.


यात्रा

नव पाषाण काल से
या लौह कांस्य युगों से
इक बुढिया
कातती रही सूत
सूरज के रेशों से
चाँद के रेशों से
और इक उम्र तक पहनती रही
इनसे सिली गयी - जैसी भी पैरहन

अकूत कल्पों की पगडण्डी पर
जीवन विरला है
पर इक मानव पृथ्वी पर
और विरला है.

सात पातालों में दबी हुंकारें
जब तब फूटती रहती है
और इस तरह जीवन की तलाश में
यात्रा जारी रहती है.



इहलोक

यह दुनिया कितनी सुंदर है
पर अफ़सोस
कि मेरे दो ही आँखें हैं.

ये कुफ्र हो चाहे
आ दुनिया
मैं तुझे अपनी बाँहों में ले लूं.

अज़ान

यह तो इतिहास की बात है
कि युगों के आरोहण के साक्षी सपने
हमेशा मुकम्मल पर अधूरे ही रहे हैं.

हाँ, मैं पीछे छोड़ आया हूँ
उन जमानों को
जो न जाने किन किन दहलीजों पर खड़े हैं
छोड़ दें उनकी तीखी यादों को, तो भी
मैं यह तो कहूँगा ही कि
यहाँ जो पहाड़ियां हैं
उनमे सूरज के संग
मेरा भी इक सपना हर रोज डूब जाता है.

तो भी
रातों की तिलिस्मी आवाजों के संग
मैं सुनता हूँ नयी सुबह की अज़ान
कि इस तरह कुछ भी ख़त्म नहीं होता
हाँ चीज़ें शुरू होती है - एकदम अचानक.

वह

रोगन उतर गया है
तस्वीरों का
काई सी जम गयी है
यादों पर
शायद इसी लिए
चुप्पी साधे हैं लोग अमूमन
पर मैं कैसे भुला दूं उसे
जो मेरा इक मुकम्मल सपना है.


कविता

मैं अपने धूल अटे कमरे में
और क्या सोचूं कि
जनन्नुतियों के महलों जैसा
सबके पास हो इक घर
तो इसीलिए यहाँ कोनों और ताकों में
ऊट पटांग चीजों के बीच लटकी है
इक मांग कि
अभी ईमान और
कानून का राज होना बाकी है.





Saturday, January 16, 2010

अमंगलकारी तत्वों के विनाश की कामना है - कविता

कविता का एक प्रयोजन है, अमंगलकारी तत्वों का विनाश. मंगल और अमंगल को समसामयिक रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता. इसकी पहचान के समय विभिन्न कारकों का निर्धारण और फिर उनके व्यापक प्रभावों को जान लेना आवश्यक हो जाता है. समाज की संरचना में जिन तत्वों का योगदान होता है उन्हीं के विरोधी प्रकृति के तत्वों को प्रायः अमंगलकारी कहा जाना चाहिए. कविता मन के आवेगों का प्रतिरूप है तो फिर वे आवेग जो उल्लास के उलट अवसादकारी स्थितियों से उपजे हैं वे निश्चय ही अमंगल से उपजी पीड़ा को बोल देते होंगे. ये शब्द मानव कल्याण की राह में उपस्थित बाधाओं के बारे में चेताते हैं. सर्वत्र सुख और असीम आनद के साथ सम भाव से जीवनयापन की चिर स्थायी चाह के फलस्वरूप मानव ने नदियाँ लांघी, पहाड़ चीरे और आसमान में पंछियों के सदृश्य उड़ने के सफल प्रयास किये. इन्हीं कार्यों का गान ही मंगलगान है.
समाज और राष्ट्र उन्नतिशील रहे हैं इसलिए उनमे परिवर्तनकारी तत्व स्थायी रूप से बना रहा है. कभी जब सामाजिक व्यवस्था जटिलता लिए हुई नहीं थी, जब व्यापार, अर्थ और संबन्ध इकहरे थे तब कविता के लिए उन तत्वों की पहचान करना मुश्किल न रहा होगा. आज दुनिया विश्वग्राम में बदलने की ओर अग्रसर हैं तो व्यवस्था और समाज के विविध रूपों से कई नए तत्वों ने स्थायी घुसपैठ प्रत्येक जीवनशैली में कर ली है. कविता अब दूर तक देखती है और फिर तुलना करती है. उसके लिए प्रारंभिक स्थापना का महत्त्व नहीं रहा वरन वह स्वयं महत्वाकांक्षी हो चली है. इसी महत्वाकांक्षा ने मंगल और अमंगल को व्यापक बनाया है. मैं इन वैश्विक आग्रहों के बीच कविता के स्थानीय भाव से उपजने को व्यक्तिगत तौर पर श्रेयस्कर समझता हूँ. कविता जब अपने कुछ किलोमीटर के दायरे में उपस्थित तत्वों का ब्यौरा लिखे साथ ही शोषण, भूख, गरीबी और प्रेम को चिन्हित कर आगे बढ़ पाए तो यह अमंगलकारी तत्वों की पहचान की कविता होगी. जो हमें नई राह दिखाएगी.
मैं अपनी बात को शब्दों के जाल में बुनना पसंद नहीं करता हूँ. क्लिष्ट शब्दों के प्रयोग से कविता होने की सहमति जुटाने के रोचक और बुद्धिचातुर्यपूर्ण खेल के बारे में वर्ष बानवे में राजस्थान केसरी समाचार पत्र में छपे एक आलेख में मैंने अपनी कई जिज्ञासाएं रखी थी. मेरा कोमल मन जानना चाहता था कि कविता कैसे लिखी लिखी जाती है ? क्या प्रकाशक और संपादक की दराज में ऐसे कोई पैमाने रखे हैं जो कविता को नापते तौलते हों ? मेरे इन्हीं प्रयासों ने मुझे कुछ ऐसे सच के सम्मुख ला खड़ा किया जिसे आज की भाषा में कहूँ तो " ब्लॉग पर घटिया से घटिया कविता लिखने वाला, प्रकाशन समूहों के यहाँ छप रहे कवियों से चरित्र के मामले में बहुत बड़ा है भले ही कविता के फ़ॉर्मूला के मामले में न हों."
आज ब्लॉग या तकनीक पर सवार होकर लिखने का समय है. बेल पत्र और ताम्रपत्र का स्थान कागज ने लिया अब कागज का स्थानापन्न है वेब पन्ना. नया होना ही जीवन का संकेत है. इन पन्नों पर मुझे बेहतरीन कविताएं पढने को मिली हैं शब्दों से खेलने की कोशिश करते नन्हे हाथ भी दिखे है।
मित्रों, आपके लिए एक कविता रख रहा हूँ. ये कविता जो एक बीस साल के नौजवान द्वारा मुझे लिखी गयी है. इसका प्रकाशन भी अभी तक नहीं हुआ है क्योंकि ये एक मित्र के द्वारा मुझे दिया गया उपहार है. मेरे उपरोक्त शब्दों पर खरी उतरती है या नहीं इसका परीक्षण आप करें. कविता के गुण ग्राहक इस ब्लॉग संसार में बहुतेरे हैं. कुछ कविता को ही समर्पित ब्लॉग हैं उन्हें देख कर मेरी आशाएं खरी होने लगती है कि कविता अमंगलकारी तत्वों को पहचानेगी और उन पर प्रहार करती रहेगी.

कवि इकराम अजमेरी शिक्षा विभाग में व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं और फिलहाल सर्वशिक्षा अभियान परियोजना चित्तोड़गढ़ में काम देख रहे हैं. उनकी इस कविता को मैंने अपने पत्रों की फाईल से चुना हैं। लिखने की तिथि, कविता के नीचे लिखी है।

मेरा ख़त

तुम्हारे ख़त के जवाब में
ख़त लिखना
अच्छा लगता है दोस्त
पर एक तो
हरकारा ही देर से आया
फिर जो सांझ थी
मेरे भीतर घिरती ही चली गयी,
तो ऐसे में
कुछ लिखा नहीं जाता मुझसे.

अफ़सोस न करना
न सोचना कुछ
यहाँ अरावली की वादियाँ
मुर्दा सपनों के आगोश में
सांझ से सुबह तक सिसकती रहती है
और लोग
महुडी और अलाव के बीच
सोते जागते से रहते हैं.

यहाँ सीने में इस कदर दर्द है
गले में ना जाने कैसे कांटे हैं
लेकिन खुदा जाने
फिर भी जबान क्यों नहीं उठती है.
यहाँ रातों की चोरी
दिन का डाका
सुबह-ओ-शाम का मातम
एक कौम या एक धर्म के जितने नाप का.

यहाँ, सर से पांव तक
नंगे लोगों की बाँहों पर
सोने के कड़े,
इन सब के बीच भी
बच्चों की पेशानी पर
एक सूरज जितना नूर.

तुम इसी रोशनी में पढ़ना मेरे ख़त को
कि मुहब्बत को
नदी नाले डुबा नहीं सकते
न हवा आंधी में उड़ सकती है ये
अपना सब कुछ भी दे डालें
तो भी कितना कम है, मुहब्बत के लिए.

[दिनांक : 2 दिसम्बर 1991]




Sunday, January 3, 2010

कवि की उदंडता यानि आभा की स्वांत सुखाय कविता के बहाने कविता क्यों और किसके लिए

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें.

बाबा नागार्जुन की इन पंक्तियों में उनके विराट रूप और मनुष्य के होने से ही सूर्य के होने की सार्थकता का बोध होता है किन्तु मेरी आभा को कविता लिखना नहीं आता, वैसे आता मुझे भी नहीं है फिर भी जीवन है तो शब्द भी हैं. पिछली सदी के नौवे दशक के पूर्व आज जितनी तकनीक और संचार की सुविधाएँ नहीं थी तब कागज पर शब्द लिखना ही दूर बैठे हुए दो मनुष्यों के संवाद का सरल और उपलब्ध माध्यम था. मैं लिखता था और वह उत्तर दिया करती थी. उसे मेरे पत्र पढ़ कर अच्छा लगता कि एक जैसे शब्दों के उपयोग के बावजूद मेरी लिखी हुई बातें अलग रस देती हैं तब उसने जाना कि ये अलग रस ही आगे चल कर कविता बनने का सामर्थ्य रखता है. उन दिनों की नुक्कड़ समझ में कविता मंच से ललकार रहे वीर रस के कवि की पंक्तियों के इतर कुछ और मानी जाती तो वह किताबों के ठेले पर मिलने वाली इश्किया शायरी से मिलती जुलती होती जिसे हम अस्वीकार कर चुके थे कि ये ही कविता मात्र नहीं है. मैं जिन लोगों से पढ़ कर बड़ा हुआ वे कवि थे और कक्षाओं में अपनी कविता का पाठ करने के स्थान पर कविता के लिए छात्रों को प्रेरित किया करते थे, इसलिए आभा को ये बता सकने में समर्थ था कि कविता आत्म प्रतिष्ठा या यशेषणा के लिए लिखे जाने के बावजूद साहित्य और समाज की धरोहर हो जाती है. उसे ये कभी स्वीकार्य न हुआ कि एक पुरुष और स्त्री के नितांत निजी अनुभवों से उपजे बोध का प्रकटीकरण क्यों कर हो ? लिखना स्वांत सुखाय है और प्रकाशन उसका प्रदर्शन मात्र. इस विचार पर एक लम्बी बहस की जा सकती है किन्तु मेरे आग्रह से उपजी सहमती पर आभा ने ब्लॉग के लिए अपनी कुछ पंक्तियाँ उपलब्ध करवा दी और अपनी पहचान को जाहिर न करने का निर्देश भी... मुझे लगा कि ये एक रचनाकार की उदंडता है या फिर ये दुर्बलता भी हो सकती है.

एक राष्ट्रीय स्तर के प्रकाशन समूह में सम्पादकीय विभाग में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार ने जब मैगजीन का कार्य देखना आरम्भ किया तो उन्होंने कोई छः महीने पहले आभा कि कुछ कविताएं ब्लॉग से उठा कर आभार सहित प्रकाशित की, इसे आप एक पत्रकार के भीतर सांस ले रहे रचनाधर्मी तत्व का सार्थक हस्तक्षेप कह सकते हैं. नव वर्ष के सु-आगत में उन्होंने अपने सम्पादकीय में एक लेखक के शर्मीलेपन से उपजी कुंठा जैसी किसी प्रवृति के बारे में इशारा करते हुए आभा की कविताएं फिर से प्रकाशित की. उनका उद्देश्य साफ़ था कि व्यक्ति अपने विकास की राह में खुद कोई दीवार न बने. उनके पास अनापेक्षित रूप से एक अन्य लेखिका का ई मेल पहुँच गया कि ये आपने मेरे बारे में लिखा है. इस घटना का विवरण मिलने के बाद आभा ने तय किया कि इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए. उसने अपने ब्लॉग में पहचान को जाहिर करने और विगत को नए स्थान पर संकलित करने का मन बना लिया. नए साल में तेजी से हुए इस घटनाक्रम के साथ कुछ और भी अफसोसनाक आयोजन कविता के नाम पर जारी रहे. श्लील और अश्लील के नाम पर बहस के रूप में आरोप प्रत्यारोप होते रहे. यश और लोकप्रियता के अंतर को न समझने वाले भी कविता के नाम पर शब्दों की हेरा फेरी में लगे रहे. बहस के तत्वों से मुझे ये समझ आया कि ये विद्वान नहीं जानते कि कविता एक प्रतिफल है. वह मनुष्य की सृजनशीलता, रचनात्मकता, भाव, आवेगों, सम्बंधों से उपजे राग और कल्पना को व्यक्त करती है. तो जो मैंने देखा, पढ़ा या सुना. वह जिनका था उन्हीं को प्रतिफल के रूप में मिल गया. उस श्लील और अश्लील में जिनका जो हिस्सा बना उन्होंने उस पर प्रतिक्रिया कर दी.

कविता क्या करती है ? ये सोचता हूँ तो पाता हूँ कि बुरे समय के कारकों को चुनौती देती है, सत्ता के मदांध अवयवों को निशाना बनाती है, कोठर बंद हुए हकों को चिन्हित करती है, राजपथों की जनपथ से तुलना करती है, लोकमंगल की कामना करती है और सबसे महत्वपूर्ण मुझे लगता है कि कविता एक संवेदनशील आदमी को आम आदमी में रूपायित कर उसकी कोमल, आहत और आशा भारी भावनाओं को शब्द रूप में जन-जन की लोकप्रिय गेय वाणी बनाती है. किस भाव से कविता का जन्म हुआ होगा ये निश्चित तौर पर कहा जाना संभव नहीं है परन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है कि कविता मनुष्य के जातीय बोध और भौगोलिक परिस्थितियों से प्रभावित हो कर आगे बढ़ी है. कविता ने रचयिता और श्रोता के बीच उपस्थित सेतु को समकालीन सामाजिक जरूरतों, व्यवस्था के दमनकारी निर्णयों, भय से उपजे दुःख और जीवन के उन सभी तत्वों से बांधे रखा है जिन्हें हम सरोकार कहते हैं.
कविता के उद्भव और जनसरोकारों व उपयोगिता के विराट फलक वाले विषय पर बात करना कभी भी असामयिक नहीं होगा किन्तु आज इस वृहद् परम्परा को आगे बढ़ाने वाले समय में जिनके हाथ में इसकी डोर के बारीक महीन धागे हैं वे कितने सजग और भीतर से समृद्ध हैं इसके बारे में कुछ पूछे जाने का अधिकार अब गिरवी रखा जा चुका है. आज का कवि भी सदा की ही भांति उदंड है वह स्वांत सुखाय कर्म में अपने को लीन बता कर प्रश्नों को हवा में ही उड़ा देना चाहता है. मैं खुद के लिए लिखता हूँ वाली अवधारणा का उदघोष करने के बाद भी गली मुहल्लों में उग आये पुरुस्कार प्रदान करने वाले संस्थानों के प्रति कभी निरपेक्ष नहीं रहा. उसने कविता रचना में जितना श्रम नहीं साधा होगा उससे अधिक उस आलोचना में लगाया जो कि आत्मप्रलाप से बढ़ कर कोई स्थान प्राप्त नहीं कर पाई.

कॉडवेल की बताई काव्य विशेषताओं के प्रकाश में मैंने आभा की कविताओं का परीक्षण नहीं किया है. प्रथम दृष्टि में अगर एक भाव भी मुझे संचरित होता हुआ दिखा तो मैंने उस कविता की तरफदारी की है और हौसला अफजाई भी. कॉडवेल कहते हैं कि कविता लयात्मक होती है, वह अनुवाद की दृष्टि में कठिन होती है, अनुक्त Irrational होती है, वह अ-सांकेतिक होने के साथ विशिष्ट संघनित भावों से पूर्ण होती है. फिर तो बड़ा दुष्कर कार्य है कविता, समाज और मनुष्य के तत्वों को जोड़ कर, सरोकारों की समीचीन बात कहना. जो गेय भी हों और शब्दों से भावों की विशिष्ट संघनित रचना करे. मैंने पाया कि कविता के शास्त्रीय स्वरूप को समझने और सीखने का प्रयास नए कवि/कवयित्रियों में एक उपेक्षित कार्य रहा है. ग़ज़ल का एक नवोदित और खूबसूरत हस्ताक्षर जब आधुनिक कविता को बेकार बताता है तो मेरी इस धारणा की पुष्टि भी हो जाती है. मैं राजस्थान के सीमान्त जिले में बड़ा हुआ हूँ. पांच-छः सौ किलोमीटर के दायरे में नौकरी करने के अलावा छात्र जीवन में जनवादी आंदोलनों में सक्रिय सहयोगी रहने से मिले अनुभव ही मेरी पूँजी है. कविता का पाठक होना उनमे से एक है. अब फिर से बाड़मेर में हूँ और सीमान्त जिले की आधुनिक कविता के पोलियोग्रसित रह जाने पर सोचा करता हूँ और लोक कविता के क्षय पर अफ़सोस. हर महीने आयोजित होने वाले कस्बाई कवि सम्मेलनों की ख़बर पढता हूँ तो मस्तिष्क में आता है कि ये कवि भी क्या कभी कविता के बारे में पढ़ते हैं ? बाड़मेर में कविता के दो नाम ही मुझे प्रभावित कर पाते हैं एक नन्द भारद्वाज जिनका सानिध्य कम ही मिला स्थानीय कवियों को और दूसरे आईदान सिंह भाटी. कविता की समझ वैयक्तिक होती है किन्तु जब आप बरसों से किसी के साथ बैठते और सुनते हैं तो अपने को संस्कृत भी करते होंगे लेकिन ये अभी दुर्भाग्य ही है.

इन दिनों में ब्लॉग पर कुछ सक्रिय कविताओं से दो चार हो पाता हूँ वे कच्ची हैं पर संभावनाओं से पूर्ण है. कुछ सूत्रों पर आधारित कविताएं हैं, हर बार फार्मूले पर खरी उतरने का प्रयास करती हुई. जो अधिक पढ़ी जा रही हैं वे अनुवाद के जरिये विश्व कविताग्राम बनाने की रोमांटिक अवधारणा से प्रेरित युवाओं द्वारा किये गए विदेशी लेखकों के अनुवाद हैं. इस विषय पर भी बहुत कहना है पर वह किसी और दिन. एक गृहणी के बेहद निजी अनुभवों और कल्पना से उपजे शब्दों से बहुत पीछे लौटूं तो भक्तिकाल को मैं व्यक्तिगत रूप से काव्य का समृद्ध काल मानता हूँ कि वे कवि पहले भक्त थे और बाद में कवि किन्तु आज ऐसा कुछ नहीं है चरित्र और अनुशासन के अभाव में कविता को भौतिकवाद के धनीभूत अँधेरे में रास्ता तलाशना बेहद कठिन दीखता है क्योंकि मानवीय मूल्यों से ही कविता का जन्म होता है. उनके अभाव में किस स्तर की कविता होगी और उसके सामाजिक सरोकार क्या होंगे ये सोचने में श्रम न करना पड़ेगा. पतनशील साम्राज्यवाद के समय में नष्ट होते जा रहे आर्थिक ढांचे के बीच भी सर्वहारा की परम मित्र कविता के उत्थान का कोई संकेत अभी दिखाई नहीं दे रहा और यकीनन मैं इस तरह की कामना का आधार इन प्रेम और वियोग से उपजी पंक्तियों को नहीं मानता हूँ. अमानवीकरण के इस दौर में संवेदनाओं और अनुभूतियों को बचाए रखने के लिए कविता एक जरूरी हथियार है. लेकिन सोलह की उम्र तक रूमानी कविता पीछा नहीं छोड़ती और आगे का रास्ता अधिक कठिन हो जाता है. व्यवस्था के दोगलेपन और अनिष्टकारी मंतव्यों पर कविता करना रूमानी नहीं करता बल्कि असहज करता है.

अभी मन के शब्द बाहर आने को व्याकुल है और मुझे विश्वास भी कि लिखना जारी रहेगा. कविता की प्यास लिए पुस्तकें टटोलता रहूँगा, फिलहाल इसे आभा के बहाने ढाणी बाज़ार में पसरे रहे सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश मान लिया जाये।
आभा की कच्ची पक्की कविताओं का पता है : http://retghadi.blogspot.com/