मेरे पास बहुत ज्यादा किताबें नहीं है, जो थोडी बहुत हैं वे भी मेरे लिए हमेशा अलभ्य-सी ही रहीं है। पिछले कुछ सालों से कमरे में सबसे ऊंचे, एक गहरे आले में ही रखी रही है। बेतरतीब सी। दिवाली की सफाई के बहाने इन्हें नीचे ले आता हूँ और इन पर जमी गर्द हटाने की कोशिश करता हूँ और इस बहाने अपने दिमाग पर जमी गर्द भी।
हाथ में 'पहल' पत्रिका का ७३ वां अंक है, धूल झाड़ कर पन्ने पलटता हूँ। एक जगह देशांतर में येहूदा अमीखाई की अशोक दा(अशोक पांडे) द्वारा अनूदित कविता ' बम का व्यास ' है। पढता हूँ। फ़िर पढता हूँ। और बम का घेरा ईश्वर से परे जाता महसूस होता है।
एक चर्चित हिन्दी कवि की किताब, जो मित्र और जोधपुर के अत्यन्त सक्षम और संभावनाशील कवि विनोद विट्ठल से दो साल पहले मांग कर लाई गई थी और लौटाई नहीं गई, हाथ में आती है। कुछ किताबों का मिलना किस तरह एक अद्भुत, हुलसा देने वाला अनुभव होता है ये इस किताब के अंदर विनोद की हाथ से लिखी पंक्तियों से जाना जा सकता है-----
बावजूद कई लोगों की आपत्ति के
मैं कह सकता हूँ
कि यह दौर
या आज की कविता
हिन्दी कविता का स्वर्ण काल है।
आज की कविता में
हर वांछित है
और वही भविष्य में
एक सुंदर वर्तमान बन सकता है।
जैसे इन दिनों
जयपुर की प्रमुख सड़कों-बाज़ारों पर
दिख रही है
अब तक की सबसे खूबसूरत लडकियां
ऐसे ही
दिख रही है- अच्छी कवितायेँ।
सुंदर लड़कियों
और सुंदर कविताओं का
साथ साथ बढ़ना
मुझे अच्छा लगता है
यही अच्छा भी है
अच्छा यही है।
(विनोद विट्ठल)
१०.११.९२
जयपुर
नानक जयंती, बाज़ार में चार घंटे की तलाशी से इसे पाया। - विनोद
शहर के इस बाज़ार में अपनी ज़रुरत की चीज़ें खरीदने आते है गाँव ढाणी के ग्राहक.हर नए फेरे में यहाँ दूर देशों की अजब गज़ब चीज़े देखने को मिल जाती है, जिन्हें देखकर विस्मय से खड़ी रह जाती है लालचंद की जोडायत.
Sunday, October 4, 2009
Friday, October 2, 2009
जनकवि हरीश भादानी - विनम्र विदा

बीती आधी सदी में कविता से जन आन्दोलन खङा कर देने वाला कोई कवि मैने देखा सुना तो उसका नाम था हरीश भादानी. जनांदोलनों का विद्यालय, कविता का महाग्रंथ, सहज जीवन का महानायक आज २ अक्टूबर के दिन हमसे विदा हो गया। 11 जून 1933 बीकानेर में (राजस्थान) में जन्मे श्री भादानी का कविता कर्म से गंभीर रिश्ता रहा। कोलकात्ता से प्रकाशित मार्कसवादी पत्रिका 'कलम' (त्रैमासिक) से भी आपका गहरा जुड़ाव रहा है। आपकी अनौपचारिक शिक्षा, पर 20-25 पुस्तिकायें प्रकाशित। आपको राजस्थान साहित्य अकादमी से "मीरा" प्रियदर्शिनी अकादमी, परिवार अकादमी, महारष्ट्र,पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी(कोलकाता) से "राहुल" और के के बिड़ला फाउंडेशन से "बिहारी" सम्मान से आपको सम्मानित किया जा चुका था। आपने 1960 से 1974 तक वातायन (मासिक) का संपादन किया और यह वातायन खुलता तभी उनको साँस आती थी नब्बे के दशक के आरम्भ में कई दिनों से बंद इस खिड़की को उन्होंने फ़िर से खोला था, श्री हरीश भादानी के लिखे सम्पादकीय का अंश प्रस्तुत है वातायन से ...
यह मनुष्य ही है जो अपने लिए रचता रहता है। इस रचाव के पेटे मनुष्य , मनुष्य को छोटा क्यों समझे ? क्यों छोटा करे ? फ़िर मनुष्य एक संज्ञा लेकर अपने ही प्रतिरूप को क्यों नकारे ? यहीं मनुष्य यह समझ ले की वह अपने प्रति रूप के बिना जी ही नहीं सकता। तब वह अपने समाज को छोटा क्यों बनाये ? इन प्रश्नों के उत्तरों को नैरंतर्य नहीं दे पाए तो आने वाली पीढियों के सोच और व्यवहार के भयावह परिणामों का दियित्व भी हम पर ही आएगा।
आईये कबीर-दादू को सुनते हुए, फूले-रज्जब को देखते हुए, विवेकानंद-रविन्द्र-राहुल की तितीर्षा लेते हुए मनुष्य के संसार को रचते रहने की कर्मणी क्षमता के साथ मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारा-चर्च के मर्म को समझें और राज-धर्म-अर्थ-समाज और वाणी लेखनी के अधिकार को रूपायित करें। ऐसा कर पाना आप-मैं और हम के लिए तभी सम्भव होगा जब हम दूसरों अथवा सवयं द्वारा लीकित सीमाओं का अतिक्रमण करने लगेंगे, इस बात पर कबीर
हद तापे जो संत है, बेहद तपे फ़कीर,
हद-बेहद दोउ तपे, वाको नाम कबीर....
हरीश भादानी
वातायन वर्ष ३२, अंक ६
मुकेश के स्वर में आरम्भ फ़िल्म के लिए गाया गया भादानी जी का गीत
वातायन वर्ष ३२, अंक ६
मुकेश के स्वर में आरम्भ फ़िल्म के लिए गाया गया भादानी जी का गीत
सभी सुख दूर से गुज़रें गुज़रते ही चले जाएं
मगर पीड़ा उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
हमारा धूप में घर छाँव की क्या बात जानें हम
अभी तक तो अकेले ही चले क्या साथ जानें हम
बता दें क्या घुटन की घाटियाँ कैसी लगीं हमको
सदा नंगा रहा आकाश क्या बरसात जानें हम
बहारें दूर से गुज़रें गुज़रती ही चली जाएं
मगर पतझड़ उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
अटारी को धरा से किस तरह आवाज़ दे दें हम
मेंहदिया पाँव को क्यों दूर का अन्दाज़ दे दें हम
चले शमशान की देहरी वही है साथ की संज्ञा
बरफ़ के एक बुत को आस्था की आँच क्यों दें हम
हमें अपने सभी बिसरें बिसरते ही चले जाएं
मगर सुधियाँ उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
सुखों की आँख से तो बांचना आता नहीं हमको
सुखों की साख से तो आँकना आता नहीं हमको
चलें चलते रहें उमर भर हम पीर की राहें
सुखों की लाज से ढांपना आता नहीं हमको
निहोरे दूर से गुज़रें गुज़रते ही चले जाएं
मगर अनबन उमर भर साथ चलने को उतारू है
सभी दुख दूर से गुज़रे ...
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