Wednesday, September 30, 2009

हरी दूब का सपना


पिछली पोस्ट में बिहारी पुरुस्कार से सम्मानित लेखक नन्द भारद्वाज का वक्तव्य आपने पढा, आज प्रस्तुत है उनके कविता संग्रह " हरी दूब का सपना " से शीर्षक कविता।

हरी दूब का सपना

कितने भाव विभोर हो कर पढाया करते थे
मास्टर लज्जा राम
कितनी आस्था से डूब जाया करते थे
किताबी दृश्यों में
एक अनाम सात्विक बोझ के नीचे
दबा रहता था, उनका दैनिक संताप
और मासूम इच्छाओं पर
हावी रहती थी
एक आदमकद काली परछाई।

ब्लेक बोर्ड पर अटके रहते थे
कुछ टूटे फूटे शब्द
धुंधले पड़ते रंगों के बीच
वे अक्सर याद किया करते थे
एक पूरे देश का सपना
बच्चे, मुंह बाए ताकते रहते
उनके अस्फुट शब्दों से बनते आकार
और सहम जाया करते थे
गड्ढों में धंसती आंखों से
आँखें,
कि जिनमे भरा रहता था
अनूठा भावावेश
छिटक पड़ते थे अधूरे आश्वासन
बरबस कांपते होठों से
और हँसते-हँसते
बेहद उदास हो जाया करते थे अनायास
हर बार अधूरा छूट जाया करता था
हरी दूब का सपना ।

...


Wednesday, September 23, 2009

साहित्य कर्म की प्रकृति और परिवेश


वरिष्ठ लेखक श्री नन्द भारद्वाज को के के बिड़ला फाउंडेशन द्वारा बिहारी पुरूस्कार दिए जाने के अवसर पर लेखक के वक्तव्य का अविकल पाठ प्रस्तुत है। इसकी उपयोगिता इसके निहितार्थ में है।


माननीय मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत जी, के के बिड़ला फाउंडेशन की अध्यक्षा श्रीमती शोभना भारतीय जी, बिहारी पुरूस्कार चयन समिति की अध्यक्षा प्रो.रमा सिंह जी, सभागार में उपस्थित साहित्यकार बंधुओं, देवियों और सज्जनों.

सबसे पहले तो मैं आदरनीय के के बिड़ला जी की पवन स्मृति को नमन करता हूँ, जो देश के आर्थिक उन्नयन और सार्वजनिक जीवन में अपनी गहरी दिलचस्पी के साथ साहित्य और संस्कृति को भी उंचा मान देते थे. यह उन्हीं की व्यापक सोच का परिणाम है कि साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाली प्रतिभाओं को उचित सम्मान दिया. इस प्रकिया में उन्होंने राजस्थान के रचनाकारों के लिए बिहारी पुरूस्कार के रूप में एक अलग स्पेस बनाया, जिसके तहत प्रदेश के कई प्रतिष्ठित रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है.

मैं बिहारी पुरुस्कार की चयन समिति के उन माननीय सदस्यों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मेरे रचनाकर्म को सदैव स्नेह और आत्मीयता प्रदान की.

माननीय अशोक गहलोत जी के प्रति मैं किन शब्दों से कृतज्ञता व्यक्त करूँ, जो सदैव मुझे स्नेह और अपनत्व की नज़र से देखते रहे हैं. आपसे मेरा निजी परिचय उतना ही पुराना है जितनी मेरे लेखन की उम्र - लगभग चालीस साल. आज आपके कर कमलों से ये पुरुस्कार ग्रहण करते हुए मुझे जो ख़ुशी मिली है, उसे शब्दों में बयां कर पाना आसान नहीं है.

मित्रों में पिछले चार दशक से हिंदी और राजस्थानी में अपने लेखन कार्य से जुड़ा हूँ, लेकिन आज भी हर रचना शुरूआती लगती है. कई बार लोग मुझसे लेखन की प्रेरणा को लेकर सवाल करते हैं तो मैं अवाक रह जाता हूँ. अगर संवाद मेरी जरूरत है तो इसमें और किसी प्रेरणा को कैसे देखूं ? लेखन मेरे लिए संवाद की तरह ही रहा है - अपने समय के साथ और खुद के साथ भी.

मैं गाँव से आया हुआ व्यक्ति हूँ, यह न तो कोई खूबी है न कोई कैफियत. वहां साहित्य या संस्कृति को लेकर ऊपरी तौर पर कोई स्वरूप या संकेत नहीं दिखाई देता. लेकिन ज्यों ज्यों आँख खुलती गयी और अपनी जड़ों की तलाश जारी रही तो पाया कि अद्भुत थी वो विरासत, जिसकी गोद में मैं पला बढा और अपना होश सम्भाला.

मरे बड़ों ने शायद यही अपेक्षा कि थी कि मुझमे वही संस्कार और रुचियाँ विकसित हों जो वे मुझ तक संजो कर लाये थे. अपनी ओर से ये भी प्रयत्न रहा कि उन चीजों को जानूं समझूं. इस लोक विरासत से मिली रामायण, महाभारत की आख्यान कथाओं को उन्ही की प्रेरणा से सुना समझा और सत्य, न्याय और लोकधर्म के प्रति एक बुनियादी आस्था अपने भीतर अंकुरित होते महसूस की.

उन्ही स्कूली दिनों कि शुरुआत में मेरे एक प्रिय शिक्षक रहे - मास्टर लज्जा राम जिन्होंने मेरे भीतर यह विश्वास पैदा किया कि जीवन में अगर कुछ सार्थक करना है तो अच्छी शिक्षा बेहद जरूरी है. मेरे इसी जीवन अनुभव से जुडी कविता है " हरी दूब का सपना" जिसके केंद्र में उन्हीं का आत्मीय व्यक्तित्व और बिखरते सपने संरक्षित है.
इस अशिटी कर्म की अपनी प्रकृति है. मैं इसे जीवन के एक सहज कर्म की तरह लेता हूँ. जैसे किसान खेती करता है, कारीगर कोई उपकरण बनाता है या एक शिक्षक, शिक्षण का काम करता है. लिखना पढ़ना मुझे उतना ही सहज और और जरूरी काम लगता है, जितने जीवन के दूसरे काम. ये बात अनुभव से ही जानी है कि रचनाकर्म किसी जन्मजात प्रतिभा का मोहताज नहीं होता. वह सुरुचि और सतत अभ्यास से ही विकसित किया जाता है.

अपने बहुविध रचनाकर्म में कविता को मैं अपने चित्त के अधिक करीब पाता हूँ. यद्यपि अन्य विधाओं के साथ मेरा वैसा ही आत्मीय रिश्ता रहा है. यों हर रचना अनुभव की पुनर्रचना का पर्याय मणि जाती है, लेकिन अपने तंई उस संवेदन को पूरी ईंटेंनसिटी और भाषिक आवेग के साथ व्यक्त करना मैं रचना की अपनी जरूरत मनाता हूँ. कविता में अक्सर चीजों के साथ हमारे रिश्ते बदल जाते हैं. यह बदला हुआ रिश्ता हमें उनके और करीब ले जाता है. वहां पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं रह जाता और न पहाड़ कोई निर्जीव आकार. शब्द वही अर्थ नहीं देते जो सामान्यतः उनसे लिया जाता है. यह काव्यानुभव जितना व्यंजित होकर असर पैदा करता है उतना मुखर हो कर नहीं.

रचनात्मकता की इन्हीं खूबियों के कारण मैं कविता को साहित्यिक अभिव्यक्ति का बेहतर फार्म मानता हूँ. रचना के भीतर मूर्त होता है जीवन यथार्थ, उसमे अंतर्निहित मानवीय सरोकार और उसके लक्षित पाठक वर्ग से बनाता रिश्ता ये तय कर पाता है कि कविता उनकी जीवन प्रक्रिया में कितनी प्रासंगिक और प्रभावी रह गयी है.

पिछले चार दशकों में अपने साहित्य कर्म के साथ मैं मिडिया में भी सक्रिय रहा हूँ. इधर इलेक्ट्रोनिक मिडिया के विस्तार को कुछ लोग कला साहित्य के लिए एक खतरे की तरह देखने लगे हैं, जबकि देखना उसे एक सकारात्मक चुनौती की तरह ही चाहिए. इस व्यवसायिक मिडिया की अपनी प्राथमिकताये हैं. अपनी साख और बौद्धिक वर्ग में घुसपैठ के लिए वह साहित्य या कला रूपों का मनचाहा इस्तेमाल बेशक कर लेता हो, लेकिन साहित्य और कला से उसका रिश्ता कतई विश्वसनीय नहीं बन पाया है.

व्यावसायिक मिडिया को हम जितनी आसानी से जनसंचार की संज्ञा से विभूषित कर बैठते हैं दरअसल वह उसके मूल मकसद के कहीं आस पास भी नहीं होता. उसकी भागीदारी वहां नगण्य होती है, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है.

लोग अक्सर इस तथ्य को गौण कर जाते हैं कि लोक भाषा, जन अभिव्यक्ति का आधार होती है. प्रत्येक जन समुदाय अपने ऐतिहासिक विकास क्रम में जो भाषा विकासी करता है वही उसके सर्जनात्मन विकास का आधार होती है. उसकी उपेक्षा करके कोई माध्यम जानता के साथ सार्थक संवाद कायम नहीं कर सकता. यह एक अनिवार्य संघर्ष है, जिसके बीच लोक भाषाओं को अपनी ऊर्जा बचा के रखनी है. साहित्य का काम इसी संघर्षशील अवाम के मनोबल को बनाये रखना है.

यहीं एक लोक कल्याणकारी राज्य की सार्थक भूमिका का सवाल भी सामने आता है. लोकतंत्र में लोक और तंत्र एक दूसरे के पूरक हो कर ही जिन्दा रह सकते हैं अन्यथा न लोक चैन से जी पायेगा न तंत्र ही साबुत रह पायेगा. दरअसल साहित्यकर्म की प्रकृति और परिवेश के संश्लिष्ट रिश्तों को समझ कर ही शायद हम किसी नए सार्थक सृजन की कल्पना कर पाएं.

अंत में, मैं के के बिड़ला फाउंडेशन के प्रति पुनः अपना आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने इस आयोजन के बहाने मुझसे आत्मीय स्नेह रखने वाले प्रबुद्धजनों के बीच अपनी बात कहने का सुअवसर उपलब्ध कराया और भावी रचनाशीलता के प्रति सचेत भी किया. आप सभी के प्रति पुनः हार्दिक आभार .