क्रांतिकारी सपनों और मुहब्बत की कहानियों के सिवा भी मैं कुछ सोचता हूँ उसी को बीच बाज़ार लाने के लिए संजय भाई ने मुझे अपने ढाणी बाज़ार में एक पेढी अलोट कर दी है। बहुत दिनों तक खुजलाने के बाद आज आखिर पंखों पर जमी गर्द को झटकने का फैसला कर लिया है। वैसे मेरी पहचान राष्ट्रीय तो क्या कस्बाई भी नहीं है। लिखने पढ़ने में इस नाकारा को दी गयी ये पेढी कैसा कारोबार करेगी अभी इसके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि अगर ये दुकाने मानवीय मूल्यों की हैं तो चल भी सकती हैं।लिखने के नाम पर मेरा कार्य गाय पर एक लेख लिखने से आरम्भ हुआ था जो दिल्ली प्रेस कि कुछ मासिक पत्रिकाओं में कविता, समकालीन अव्यवसायिक आयोजनों में छुटपुट रचनाओं और वामपंथी समाचार पत्र "लोक लहर" में 13 जनवरी 1991 में छपी एक रपट "शक्ल मोमना दी कम काफिरां दे" जिसका अंग्रेजी अनुवाद भी Peoples Democracy के अंक में "Infidels in garb of pious peoples" के रूप में छपने के साथ समाप्त हो गया था। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का अध्ययन बेकार नही गया वैसे किसी भी तरह के अर्जित ज्ञान का क्षय हो सकता है पर उसे मिटाया नहीं जा सकता। उसी ज्ञान के ककहरे के साथ जीते हुए, मैंने कभी संजय से पूछा ही नहीं कि वो क्या है वामपंथी, प्रगतिशील, दक्षिणपंथी या उन लोगों में हैं जो "न लीपने के हैं न पोतने के" यानि जिनका कोई पंथ नहीं है।
बेकार के समय में सपने देखना काफी नहीं है हमें जीवन को जीना और सपनों को साकार करने का व्यवसाय करना होता है। इसके लिए घर से निकल जाना जरूरी है। जिस बेहतर सामाजिक ढाँचे की मांग हम करते हैं उसके लिए किया क्या है ये सोचना भी जरूरी है या फ़िर गाली गाली खेलना मात्र। भाई करेंगे क्या ब्लॉग पर ? जब मैं अपने आप से पूछता हूँ तो मुझे दिखाई देती है मेरी प्रतिबद्धता जो फिलवक्त सरकारी नौकरी और परिवार तक सिमित हो गई है, कुछ कहानियाँ और फीचर अपनी डायरियों में लिखता रहता हूँ जिनमे से कुछ को मैं अपने ब्लॉग पर भी लगा दिया करता हूँ, पढ़ने के नाम पर कोई पुस्तक घर तक का सफर तय कर लेती है उसे ही देख पाता हूँ। पाठक की निराशा वैयक्तिक हो तब तक ज्यादा चिंता नहीं होती किंतु मैं अपने सहपाठियों को भी उसी ऊब में देख कर परेशान हो जाता हूँ। बहुत कुछ खो देने के कारण पिछले एक साल से मैं असहज हूँ और इन दिनों नन्द भारद्वाज द्वारा संपादित और विवेचित कवि लच्छी राम तावनिया की "करण कथा" पढ़ रहा हूँ।
प्रसार भारती में प्रथम पंक्ति के अधिकारी रहे श्री भारद्वाज का परिचय बहुत बड़ा है। 2004 में केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरूस्कार से प्रतिष्ठित श्री भारद्वाज कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संवाद, अनुवाद आदि विधाओं में सशक्त हस्ताक्षर हैं। जिस साल मेरा जन्म हुआ तब आपने एक स्थानीय दैनिक के सम्पादन से लेखन कार्य आरम्भ किया था। अल्बेयर कामू के उपन्यास "ल स्ट्रेंजर" के राजस्थानी अनुवाद "बैतियाण" हो या फ़िर लोक सम्पदा के ठेकेदारों को खरी खरी सुनाने का काम, आपने कभी समझ और दायरों से समझौता नहीं किया। वर्तमान समय के कारपोरेट तंत्र में शासन ने साहित्य और संस्कृति को रंगीन परदों पर छाप कर सालाना जलसों में बदल दिया है ऐसे में किसी डिजिटल फ़िल्म के तीन घंटों के शो की ही भांति साहित्य की मातम पुरसी की जा रही है। कागज का पता नहीं अनुदान पर चुप्पी प्रकाशकों से गहरा अलगाव और व्यवसायिक सोच अपनाने के नाम पर क्या छप रहा है और उसके दीर्घकालीन प्रभाव क्या क्या है कोई देखने वाला नहीं।
पदनाम और प्रतिष्ठा के लिए सरकारी आशीर्वाद से छपने के अतिरिक्त आज नए लेखक की कोई पुस्तक देखता हूँ तो उसमे मुझे लेखक के पसीने की गंध आती है सोचता हूँ कि कितनी चिरोरियाँ करके और अपने धन से ये प्रकाशन का सुख नसीब हुआ होगा। इसके विपरीत श्री भारद्वाज के लिए कोई भी प्रकाशक सहज मुस्कान के साथ कोई कृति छापने को तैयार होता ही होगा तो इस लेखक के पास अपने लिखे हुए की कमी भी नहीं है फ़िर भी अपनी सोच के पारदर्शी आवरण को वे वैसा ही स्थापित करते है और दुनिया के लिए एक अनजाने कवि की रचना को प्रकाश में लाते हैं। पुस्तक को पढ़ने पर इसमे लगे श्रम और प्रयासों को सहजता से समझा जा सकता है। यह शोध पत्र मुझे इसलिए भी अपनी और खींचता हैं क्योंकि कवि लच्छी राम से हमारा नाता सम्मान पूर्वक जुड़ता भी है। दूसरी महत्वपूर्ण बात ये कि पुस्तक एक विलक्षण कवि को विस्मृत होने से बचाती है। ये कवि की विहंगम दृष्टि का दस्तावेज है।
भरी सभा में दुशासन ने जब चीर हरण का प्रयास किया तो कोरवों और पांडवों की इस अनीति पर कर्ण हँसे बिना ना रहा सका। द्रौपदी ने कर्ण की इस हँसी को अपने प्रति उपहास के रूप में ग्रहण किया और उसे श्राप दिया की वह जरूर मारा जाएगा। कवि लच्छी राम तावानियां ने महाभारत के इसी प्रसंग को आधार बना कर खंड काव्य करण कथा की रचना की। कवि के अनुसार कर्ण की हँसी द्रौपदी का उपहास ना हो कर दुर्योधन और दुशासन के अनैतिक आचरण, पांडवों की अदूरदर्शिता पर थी जो अनिष्ट का हेतु बन रहे थे।
कुण झेले इन करण री त्रिभुवन में तरवार
अरजुन के सिर उपराँ लाख हरी का हाथ हज़ार !!
कवि ने कर्ण को योग्य और कई महानायकों से अधिक गुणवान बताया है वे उसे परिस्थितियों से घिरा एक ऐसा वीर मानते हैं जैसा युगों में आगे पीछे होना अप्राप्य है। अधर्म का साथ देने के कारण कर्ण को यश प्राप्त नहीं हुआ किंतु इसी खंड काव्य में कवि कहता है कि कृष्ण को भी कर्ण की दानवीरता के कारण दर्शन देना पड़ा था और उनसे कामना पूर्ति हेतु कुछ माँगने को कहा गया था तो जिसने जीवन भर दिया हो वह किसी से क्या मांगता ? कर्ण ने कहा मेरी मृत्यु के पश्चात मेरा दाह संस्कार इदंग भूमि पर किया जाए। इदंग भूमि अर्थात जहाँ किसी कि मृत्यु न हुई हो । समस्त पृथ्वी पर कृष्ण को ऐसी जगह नहीं मिली तब पृथ्वी ने स्वयं प्रकट हो कर गंगा किनारे पद्म शिला नामक स्थान इंगित किया। कविका का चिंतन व्यापक है उनकी दीठ अनूठी है। वे इस खंड काव्य में संदेश देते हैं "दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं जहाँ किसी की मृत्यु ना हुई हो। दुनिया में ऐसा कोई काल नहीं था जब अन्याय और अपराध ना हुआ हो और ऐसा भी कोई समय न था जब लोक के अलौकिक हो जाने की कामना न की गई हो।"
करण कथा के माध्यम से भारद्वाज जी के व्यक्तित्व को भी समझा जा सकता है. वे जितने विचार में प्रगतिशील और सर्व हितचिन्तक हैं उतने ही अपने आचरण में भी हैं ये दुर्लभ है और ऐसी दुर्लभता ही हम सबको कवि लच्छी राम तक पहुंचाती है.
[कवि लच्छी राम तवानियाँ कृत "करण कथा" पाठ संपादन और विवेचन नन्द भारद्वाज :प्रकाशक रचना प्रकाशन 57 नाटाणी भवन, चांदपोल बाज़ार , जयपुर 302001]