आज इस ठिकाने पर लंबे अरसे से आना हुआ है. माफ़ी. सुनते हैं सावण खां से ये राजस्थानी गीत 'हिचकी'.
लहज़े में आ रहे सिंधी पुट पर गौर करें और गाने का भरपूर आनंद उठायें.
ढाणी बाज़ार
शहर के इस बाज़ार में अपनी ज़रुरत की चीज़ें खरीदने आते है गाँव ढाणी के ग्राहक.हर नए फेरे में यहाँ दूर देशों की अजब गज़ब चीज़े देखने को मिल जाती है, जिन्हें देखकर विस्मय से खड़ी रह जाती है लालचंद की जोडायत.
Monday, July 18, 2011
Friday, March 4, 2011
मुझे एग्जाम से डर लगता है...
कुछ दिन पहले ध्रुव महाशय(छोटे सुपुत्र) नाराज हो गए.कहने लगे स्कूल नहीं जायेंगे चाहे जो कर लो...हमने वजह जाननी चाही तो पता चला थिएटर
के पीरियड में उन्हें 'एग्जाम से बचने के तरीके' पर एक प्ले लिखना और छ बच्चो कि टीम के साथ एक्ट करना है.श्रीमती जी स्कूल के इस कृत्य पर बहुत नाराज हुई.मामला तूल पकड़ता जा रहा था.हमने सोचा हम बीच में नहीं पड़े तो बेचारे प्रिंसिपल और स्कूल की खैर नहीं है.हमने मामला सँभालने के प्रयास करते हुए छोटे मियां से अन्दर की बात पूछी तो पता चला कि साहबजादे क्लास में प्ले पर बड़ी बड़ी हांक आये है.तो क्लास टीचर ने फटाफट एक टीम बना कर नवोदित और भविष्य के शेक्सपीयर को छोटा सा काम दे दिया.अब जब मामला काबू से बाहर हो गया तो स्कूल से छुट्टी करना ही हल नजर आया.तो मैंने एक छोटा सा प्ले बिना किसी तकनीक की जानकारी के लिख कर दे दिया.यह सोच कर कि एक बार मामला रफा दफा हो जाएगा.
क्लास में ध्रुव का प्ले चल निकला.टीचर्स ने शाबासी दी.पर मुझे अच्छा जब लगा जब ध्रुव और उसके दोस्तों ने पात्रों के भावार्थ को न केवल समझा बल्कि बहुत मजे लेकर एक्ट किया.और रात को सोने से पहले ध्रुव ने गुड नाईट किस दिया और कहा -''मेहनत के साथ जाएंगे तो एग्जाम से डर नहीं लगेगा.यानी कि मेहनत लड़की नहीं है...और एग्जाम लड़का नहीं है...बहुत मजेदार प्ले है.आप सबसे अच्छे पापा हो.''
चौथी क्लास के बच्चे के मुह से ये शब्द मेरे लिए साहित्य के नोबल पुरस्कार से काम नहीं थे.
मुझे एग्जाम से डर लगता है...
पात्र
मेहनत-नकचढ़ी लड़की
एग्जाम -मोटा लड़का
उन्नति - प्यारी लड़की
श्याम -आलसी लड़का
ध्रुव-आलसी लड़का
मोहित-मेहनती लड़का
अवनीश -मेहनती लड़का
(क्लास रूम का दृश्य'-एक बेंच पर दो आलसी लड़के बैठे है.लंच ब्रेक के समय में आपस में बात कर रहे है)
श्याम - तुमने उन्नति का नया विडिओ गेम देखा ?ध्रुव - देखा तो नहीं पर पता चला है बहुत शानदार है|श्याम - हाँ! पर अफ़सोस उन्नति से बात नहीं कर सकते| वह एगजाम है न ! उससे डर लगता है| वह बीच में आ जाता है|(निराशा से सांस छोड़ता है)(मोहित आता है)मोहित- आज तो मजा आ गया क्या शानदार गेम था!अवनीश-सच्ची...बहुत मजा आया.ध्रुव- क्या तुम उन्नति के विडिओ गेम कि बात कर रहे हो?मोहित- हाँ!उसने हमें खेलने दिया.श्याम- क्या तुम्हे एगजाम से डर नहीं लगा ?क्या एग्जाम वहां नहीं था?मोहित- था!उससे डर भी लगा....पर हम मेहनत के साथ गए थे.अवनीश- ...एग्जाम ने कुछ नहीं किया.हमें उन्नति ने वीडियो गेम दिया...और बस!हम खेलते रहे ...सच में बहुत मजा आया!ध्रुव- मेहनत?...मुझे नफरत है उससे !मोहित- क्यों?ध्रुव- वह बोरिंग है.हमेशा पढने को कहती रहती है...क्लास वर्क करो!होम वर्क करो!लेसन लर्न करो!टेबल्स याद करो...उफ़ बस!मेहनत- (क्लास में प्रवेश करती हुई गुस्से में बोलती है) तो क्या गलत कहती हूँ?क्या तुम्हे पता नहीं कि तुम यह सब लर्न नहीं करोगे तो कुछ भी बन नहीं सकते.ध्रुव- लेकिन मुझे यह सब करना बिलकुल पसंद नहीं है.मेहनत- ये सब जरूरी है.अगर तुम सिर्फ वही करते रहे जो तुम्हे पसंद है तो तुम कभी तरक्की नहीं कर सकते.....तुम डॉक्टर, इंजीनिअर,टीचर या कोई भी सफल इंसान नहीं बन सकते....समझे तुम!ध्रुव - मुझे परवाह नहीं!मैं तो उन्नति के पास जाना चाहता हूँ और उसका वीडियो गेम खेलना चाहता हूँ.बस!मेहनत- तो चले जाओ!कौन रोकता है तुम्हे?ध्रुव- बस,उस मोटे और भयानक एग्जाम से डर लगता है.हमेशा उसके आस पास रहता है....और बाई द वे! जब तुम किसी के साथ होती हो तो वो कुछ नहीं करता!मेहनत- हाँ!!..क्योंकि वह मुझसे डरता है.मै हमेशा पूरी तैयारी और लर्न करवाने के बाद ही किसी को उन्नति से मिलवाती हूँ...एग्जाम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है.
(एग्जाम का प्रवेश..हाथ पाँव फैला कर सीना चौड़ा करते हुए आता है)एग्जाम-हाय, गाइज..कैसे हो?(ध्रुव और श्याम डर से कांपने लगे है...)
एग्जाम- डरो मत बच्चो...!पढ़ाई करो! मेहनत करो!!जो बच्चे पढ़ते है और मेहनत करते है (मोहित की तरफ इशारा करता है)उन्हें मैं कुछ नहीं कहता हूँ.परन्तु....!
(डर से कांपते ध्रुव और श्याम की तरफ इशारा करते और उन्हें डराते हुए)जो मेहनत और पढ़ाई नहीं करते उनको मैं कच्चा चबा जाता हूँ......हा हा हा हा हा ! . ...समझे!!!ध्रुव और श्याम- (डरते हुए)समझ गए...समझ गए...अब हम कभी पढ़ाई से जी नहीं चुराएंगे...मेहनत करेंगे.हमें माफ़ कर दो एग्जाम!
एग्जाम-- ठीक है...!हू हा हा हा हा!!(जोर से हँसता है)उन्नति - (वीडियो गेम लेकर कक्षा में आती है)तो बच्चों मेरे साथ खेलना हो तो खूब पढ़ाई करना!एग्जाम तुम्हे बिलकुल तंग नहीं करेगा!(हंसती हुई दर्शको को हाथ हिलाती है)
(पर्दा गिरता है)
Wednesday, February 16, 2011
क्या कभी रेत को बहते हुए देखा है...!!
बस यूँ ही सारे काफ़िये, रदीफ़, छंद,बहर, मीटर-पैरामीटर को दर-किनार रखते हुए....
कुछ अपनी कहो कुछ अपनी कहें
कुछ अपनी कहो कुछ अपनी कहें
यादों के मरुस्थल में रेत से बहें
बुरा क्या हो गर ये रिश्ता बना लें
मेरे ख़याल सारे ज़हन में तेरे रहें
बिछ गई चादर बर्फ की चलो अब
कुछ गुनगुनी हो जाये धूप से कहें
समझौते फ़ितरत बन गए उसकी
कहता था अक्सर कि कब तक सहें
Sunday, October 10, 2010
खुदा भी था वहीँ जहाँ राम समाया था,
संजय भाई और किशोर भाई कई दिनों से ढाणी बाजार पर पोस्ट लगाने को कह रहे थे...अब जब अपना प्रमुख ब्लॉग ब्लॉगर महाशय ने अटका रखा है..तो सोचा ढाणी बाजार का सहारा लिया जाए...आपसे राय भी चाहता हूँ कि नया ब्लॉग ही बनाया जाए तो कैसा रहेगा...इस पर तो फोलोवर्स ने आना ही छोड़ दिया है...अयोध्या पर दिली विचार जो मैंने अपनी पोस्ट पर भी लगा रखे है ढाणी बाजार पर आपको पुन: प्रस्तुत कर रहा हूँ...
उसने अपना दिल चीर के दिखाया था.
खुदा भी था वहीँ जहाँ राम समाया था,
नफरत के दरिया में दोनों बहने लगे थे
सियासत ने इस कदर जुल्म ढहाया था.
बड़ी ही हिकारत से देखा था हरबार उसको
जख्मो पे जिसने मरहम आज लगाया था
देख उसको जो कह रहा है सब तुझे दूंगा
खंजर से कल जिसका तूने खून बहाया था
सियासत कांप रही थी,तख़्त हिलने लगे थे
माजरा कुछ नहीं, बस साथी हाथ बढाया था
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पुन:प्रकाशन
Saturday, September 11, 2010
किस काशी को चले थे ?
हमारे पास लौट कर क्या आता है ? कुछ भी तो नहीं. सब छूटता जा रहा है पल, घड़ी दिवस और सब कुछ. हम सफ़र के आगाज़ में कितने खुश थे कि गिरते पड़ते हुए भी लकड़ी के तिपहिये को नहीं छोड़ते थे. हर बार उसी पर गिरते और उसी के सहारे उठ खड़े होते थे. तिपहिये टूट गए और वे पीछा करते हुए साये भी नहीं रहे जो अक्सर गिरने से पहले उठा लिया करते...
दीवारें धुंधली हो गई हैं. मैं अपने घर को वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसा पिता सौंप कर गए थे कि इससे मेरी माँ को यकीन होता है कि उनका ही तामीर किया हुआ है. ऐसे ही कई बीते हुए दिनों की शामों की पदचाप मेरी स्मृतियों में जागती है तो ज़िन्दगी के टुकड़े बीस साल के हिसाब से करने शुरू करता हूँ. इस दूसरे टुकड़े के अवसान के समय जाने ऐसा क्यों लगता है कि कुछ लौट कर आता है.... जैसे इकराम अजमेरी की इन दो कविताओं को पढ़िए
अंत में
मैं तुम्हें लिखना चाहता था
मौसम के बारे में
कि अप्रेल के आखिर से ही
गर्मी बहुत बढ़ गयी है
लेकिन गर्मी का बढ़ जाना
कोई ऐतिहासिक घटना नहीं है
इसलिए मैंने
इसे लिखने का विचार छोड़ दिया है
फिर मैं तुम्हें अपनी इच्छाओं के बारे में बताना चाहता था
और अपनी इच्छाओं को सुनने वाला पहला श्रोता बनाना चाहता था
लेकिन जब मैंने उन्हें सुनाने की तैयारिया की
और उनके सार को तलाशा
तो मुझे मालूम हुआ कि
मेरी इच्छाएं भी सामान्यतया कोई आकर्षण नहीं जगाती है
इस विचार को भी मैंने छोड़ दिया है.
स्मृति
तब से चला वेताल
अब पहुँच गया निर्जन में
जिसकी तिथियाँ अनचीन्ही है
दिग्भ्रमित हो गया समस्त चिंतन
लील रहा है खुद को
और दसों दिशाओं से जल, थल नभ को भी
कि किस काशी को चले थे
और कहाँ पहुँच गए हम
अब कैसे कहाँ जाएंगे हम ?
दीवारें धुंधली हो गई हैं. मैं अपने घर को वैसे ही रखना चाहता हूँ जैसा पिता सौंप कर गए थे कि इससे मेरी माँ को यकीन होता है कि उनका ही तामीर किया हुआ है. ऐसे ही कई बीते हुए दिनों की शामों की पदचाप मेरी स्मृतियों में जागती है तो ज़िन्दगी के टुकड़े बीस साल के हिसाब से करने शुरू करता हूँ. इस दूसरे टुकड़े के अवसान के समय जाने ऐसा क्यों लगता है कि कुछ लौट कर आता है.... जैसे इकराम अजमेरी की इन दो कविताओं को पढ़िए
अंत में
मैं तुम्हें लिखना चाहता था
मौसम के बारे में
कि अप्रेल के आखिर से ही
गर्मी बहुत बढ़ गयी है
लेकिन गर्मी का बढ़ जाना
कोई ऐतिहासिक घटना नहीं है
इसलिए मैंने
इसे लिखने का विचार छोड़ दिया है
फिर मैं तुम्हें अपनी इच्छाओं के बारे में बताना चाहता था
और अपनी इच्छाओं को सुनने वाला पहला श्रोता बनाना चाहता था
लेकिन जब मैंने उन्हें सुनाने की तैयारिया की
और उनके सार को तलाशा
तो मुझे मालूम हुआ कि
मेरी इच्छाएं भी सामान्यतया कोई आकर्षण नहीं जगाती है
इस विचार को भी मैंने छोड़ दिया है.
स्मृति
तब से चला वेताल
अब पहुँच गया निर्जन में
जिसकी तिथियाँ अनचीन्ही है
दिग्भ्रमित हो गया समस्त चिंतन
लील रहा है खुद को
और दसों दिशाओं से जल, थल नभ को भी
कि किस काशी को चले थे
और कहाँ पहुँच गए हम
अब कैसे कहाँ जाएंगे हम ?
Friday, June 18, 2010
कहानी- क्षत्रिय उग्ररूप का शिलालेख- प्रकाश सिंह राठौड़

ढाणी बाज़ार में आज प्रकाश सिंह राठौड़ की कहानी पेश है जो बहुत पहले उन्होंने अपने ब्लॉग पर लगाई थी। व्यक्तिगत रूप से ये कहानी मुझे बहुत पसंद है और उम्मीद है आप सबको भी पसंद आएगी। कहानी मरुस्थल के ऐतिहासिक स्थल किराडू के गिर्द घूमती है। ज़ाहिर है इसमें काल भी ८००-९०० साल पहले का दिखाया गया है।
सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दुर्गम जान पड़ रहा था.
"रक्षक सावधान है!"काफिले के आगे चलते घुड़सवारों की रक्षापंक्ति में मुख्य रक्षक अतिरथ ने जम्हाई लेते हुए अस्पष्ट से स्वरमे कहा.
"रक्षक सावधान है!"थोडी दूर पीछे चलते रक्षकों ने यंत्रवत दोहराया.
"रक्षक सावधान है!"का स्वर घोष हर पीछे वाला रक्षक दोहरा रहा था और इस तरह से यह अंतिम छोर तक पहुँच रहा था.
"कारवाँ सुरक्षित है!" अंतिम रक्षक ने कहा और अब यह नया घोष मंथर गति से पीछे से आगे बढ़ने लगा.
पिछले पंद्रह दिनों से यह कारवाँ कुछ इसी तरह से आगे बढ़ रहा था.सिंध से भृगु कच्छ का ढाई महीनों का सफ़र सबसे कठिन यात्राओं में गिना जाता था.सिंध कि सौदे बाजी में मशहूर चीन का रेशम मिश्र के हाथी दांत विदेशी शराब,आबनूस औए सोना चांदी सब के सब बेश कीमती सामान काफी अच्छे सौदे से हासिल किये थे.वर्षा ऋतू आरम्भ होने से पहले भृगु कच्छ पहुँचने पर इनके अच्छे सौदे होने कि सम्भावना थी.वहां मानसून से पहले समुद्री मार्ग से कोई यात्रा संभव नहीं थी.और इस रास्ते व्यापरी कम जाना पसंद करते थे.धनगुप्त कि गिनती साहसी सार्थवाहों में होतीं थीं और वह इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था. किरात कूप नगर अब व्यापारियों और ब्राह्मणों का नगर था.यहाँ पर भी देसी गुग्गुल पन्ना और ताँबा स्थानीय व्यापारियों द्वारा काफी सस्ते दामों में बेचा जाता था.तो वह भी खरीद कर आगे ले जाया जा सकता था.
मरू प्रदेश का यह क्षेत्र अठारह कोस में फैला हुआ था.कारवाँ के अनुभवी लोग इसको एक दिन में पार करना ही सुरक्षित समझते थे.एक तो इस क्षेत्र में पानी नहीं था,दूसरा यहाँ किरात बसते थे जिनके बारें में बड़ी भयानक बातें सुनी गईं थीं.
वे अपने आप को किसी भी जानवर के रूप में बदल सकते थे.
वे जादू टोना जानते थे और धनुर्विद्या और प्रस्तर प्रक्षेपण में अत्यंत दक्ष होते थे.और भी जाने कितनीं बातें...कितनी सही कितनी गलत कुछ पता नहीं.
धनगुप्त उनसे सामना न होने की प्रार्थना ही कर सकता था.
फिर दक्षिण पश्चिम दिशा से रेत का बवंडर उठते दिखाई दिया.जो भयानक तरीके से उनकी और आता दिखाई पड़ रहा था.
"श्रीदास,रेत का तूफ़ान आ रहा है.हमें कारवाँ रोक देना चाहिए."धनगुप्त ने साथी वणिक को कहा.
टीले से नीचे उतरने के बाद काफी बड़ा मैदान रुकने के लिए उपयुक्त स्थान था.वहां पर गोल घेरे में बैलगाडियां और ऊँट गाडियाँ खड़ी कर दी गईं.रक्षकों ने भी अपने आप को फैला लिया.
थोडी देर बाद ऐसा तूफ़ान शुरू हुआ जिसमे अपना हाथ भी सुझाई न दे.और उसने रुकने का नाम न लिया.
कुछ गाड़ियों पर रहने के तम्बू लगे थे,कुछ में पशुओं के चारा और बाकी गाड़ियों पर सामान के गट्ठर थे जो चमडे के पालों से ढंके थे.
धनगुप्त और श्रीदास ने ऊँट गाडी के ऊपर बनाए बड़े से तम्बू में शरण ले रखी थी. आपस में बात करते करते धनगुप्त थोडी थोडी देर में तम्बू से बाहर झाँक कर अंधड़ का जायजा ले रहा था.जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था उसकी व्यग्रता और चिंता बढती जा रही थी.वह उठकर तम्बू से बाहर आगया शायद यह सोच कर कि कदाचित ऐसा करने से तूफ़ान रुक जाए पर एक तेज झपेटे ने उसकी आँखों में काफी रेत भर दी.वह फिर तम्बू के भीतर आगया.
"श्रीदास, लगता है आज प्रकृति हमारे विपरीत संचालित हो रही है.हमें यह क्षेत्र रात में पार करना पड़ सकता है,जो सुरक्षित तो नहीं है पर इसके सिवाय को चारा नहीं है."धनगुप्त ने कहा.
"पर अभी तो तूफ़ान ऐसा चल रहा है कि दिन में भी नहीं बढ़ पा रहे है."
"मौसम ठंडा होते तूफ़ान धीमा पड़ जाएगा."
"और हम रात में यहां रुक जाएँ तो?"श्रीदास की अनुभव हीनता उसकी बातों में दिखाई पड़ रही थी.
"नहीं,ऐसा नहीं कर सकते कल के दिन के लिए हमारे पास पानी नहीं बचेगा."धनगुप्त ने सांस छोड़ते हुए कहा.
ढेर सारी चिंताओं के बीच में अंधड़ की गति कुछ कम हुई.रात्री के प्रथम प्रहर बीतते अंधड़ रुक चुका था.अंधड़ और अँधेरे का परिणाम था कि मार्ग का कोई पता नहीं चल रहा था.आकाश में रेत पसरी होने से तारों से भी दिशा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.अब सार्थवाह कि विगत स्मृतियों और अनुभव के सहारे ही कारवाँ को आगे बढ़ना था.
मध्य रात्रि तक चलने के पश्चात मार्ग के दायीं और पहाडियों की श्रृंखला दिखाई दी.धनगुप्त ने आँखे फाड़ करके यह सुनिश्चित किया कि जो दिख रहा है वह भ्रम नहीं है.मरू प्रदेश में वे लोग वहां पहुँच गए थे जहां पानी मिल सकता था.
पहाडियों के बीच छोटा सा नगर बसा था.द्वार पर रक्षक पहरा दे रहे थे.
"कौन है?"रक्षक ने कठोर स्वर में पूछा.
"मैं धनगुप्त हूँ,पुरुषपुर की एक वणिज श्रेणी का श्रेष्ठी और सिंध से आए एक कारवाँ का सार्थवाह.अपना कर लो और हमें भीतर आने दो."धनगुप्त ने कहा.
"कारवाँ कितना बड़ा है?"रक्षक ने पूछा.
"एक सौ बीस गाडियां है.डेढ़ सौ रक्षक और दो सौ अन्य व्यापारी और सेवक है."
"दो सौ सिक्के."
धनगुप्त ने कमर में बंधी दो सिक्कों की थैलियाँ निकल कर रक्षक को दे दी.
"यहाँ धर्मशाला होगी?"
"आगे जाकर बाई ओर मंदिर के पास."
थोडी देर में धर्मशाला के पास के मैदान में गाडियाँ पंक्तिबद्ध खड़ी थी.और सभी लोग अपने अनुकूल स्थानों पर निद्रा की गोद में विश्राम कर रहे थे.
अचानक तीव्र कोलाहल सुन कर धनगुप्त की आँख खुल गई.पहाडों से प्रस्तरों और तीरों की बौछार हो रही थी.
"सावधान!किरातों ने आक्रमण कर दिया है..."
धनगुप्त धर्म शाला से बाहर निकला ही था कि एक क्षिप्त प्रस्तर तेज गति से उसके कान के पास से गुजरता हुआ खम्भे से जा टकराया. खम्भे से चिंगारियां निकली.चारों तरफ अफरा तफरी मची हुई थी.नगर निवासियों ने अपने घरों के द्वार बंद कर दिए. शहर के रक्षक किरातों का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे.
"अतिरथ,अपने रक्षकों को सावधान कर प्रत्याक्रमण करने को कहो."धनगुप्त ने मुख्य रक्षक को चिल्लाते हुए कहा.
थोडी देर में कारवाँ कि रक्षक सेना नगर रक्षकों के साथ मिल कर लड़ने लगी.धनगुप्त ने श्रेणी के व्यापारियों को भी शस्त्र सँभालने को कहा.नगर कि सेना इस हमले के लिए तैयार नहीं थी.और किरातों के ऐसे सुनियोजित हमले कि उम्मीद किसी ने नहीं की थी.मुख्य रक्षक सतर्क निगाहों से हमले की दिशा भांपने का प्रयास कर रहा था.तीर और पत्थर सभी दिशाओं से आरहे थे.उत्तरी पहाडी से बार बार ऊंची आवाजे आरही थी.उसको अनुमान लगाने में देर नहीं लगी की किरातों का आक्रमण वहीँ से ही नियंत्रित किया जा रहा है.कारवाँ की सुरक्षा करते ऐसे कई अचानक हमले झेलने का अनुभव उसके काम आ रहा था.उसने अपने दक्ष रक्षकों की एक टुकडी को शीघ्रता से निर्देश दिए.थोडी देर में पन्द्रह रक्षकों की टुकडी दीवारों और पत्थरों की ओट में उत्तरी पहाडी की ओर बढ़ गई.उन लोगों ने पहाडी पर चार किरात युवकों को घेर लिया और बंदी बनाते हुए हमला रोकने को कहा.हमला रुक गया और इधर भोर का उजाला फैलने लगा.
चारों युवकों को नगराध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया गया.चार पांच सौ किरात अभी भी नगर पर घेरा डाले पहाडियों पर स्थित थे.उनका नेता उग्ररूप बंदी बनाया जा चुका था इसलिए हमला रोक दिया गया था.पर अगर बंदियों को नुक्सान पहुँचाया जाता तो हमला फिर किया जाना अवश्यंभावी था.
"किरात युवक, यह अनावश्यक आक्रमण क्यों की गया?"नगराध्यक्ष ने पूछा.
"आपने हमारे जलस्रोत पर अनुचित अधिकार कर रखा है."उग्ररूप ने कहा.
"यह सही नहीं है.यह हमारा नगर है.और जलस्रोत भी हमारा है.इस पर तुम कैसे अधिकार जता सकते हो ?"नगराध्यक्ष ने कहा.
"चालीस बर्ष पहले आपके कारवाँ यहाँ से गुजरते थे और हमारे कूप से पानी ले जाने की प्रार्थना करते थे.और फिर आपने अपने मंदिरों में पूजा के लिए यहाँ से पानी लेना आरम्भ किया.और अब आपने हमारे जलकूप के चारों और भी दीवार बनादी.अब हम अपने जलकूप के उपयोग से वंचित का दिए गए है."उसने उत्तर दिया.
"तुम कदाचित सही नहीं हो युवक.यह नगर परमार शासकों की सुरक्षा में बरसों से है.इस कूप पर किरात लोगों के अधिकार में होने अथवा बसने का कोई प्रमाण नहीं है."नगराध्यक्ष ने शांत स्वर में कहा.
"इसका प्रमाण है इसका नाम ...किरात कूप !जो अब आपके नगर का भी नाम है.रही हमारे बसने की बात तो हम प्रकृति पुत्र है.हम सारी प्रकृति में बसते है.और हम आवश्यकतानुसार ही यहाँ आते है."उग्ररूप ने दृढ़ता से कहा.
"ठीक है युवक हम तुम लोगों को पश्चिमी द्वार से पानी के लिए आने की अनुमति दे सकते है."
"नहीं, यह नहीं हो सकता है !हम मंदिर में वह जल नहीं चढा सकते जहाँ से अस्पृश्य किरात पानी भरें.हमने सिन्धुराज से मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने की विनती की थी तभी यह दीवार बनाई गई है."मंदिरों के धर्माधिकारी ने रोष भरे स्वर में आपत्ति प्रकट की.
"नगराध्यक्ष अनुमति दे तो में कुछ कहूं."धनगुप्त जो अब तक चुप था, बोला.
"अवश्य कहो सार्थवाह."
"पानी कभी अपवित्र नहीं हो सकता है ,हमने अपनी दुर्गम यात्राओं से से यही सीखा है.और फिर इस मरू प्रदेश में तो यह अमृत है..और.."
धर्माधिकारी का चेहरा रोष से तमतमा उठा,"जगह जगह की यात्राओं पर जाने वाले वणिक शास्त्रों के अनुसार अपवित्र होते है...देव पूजन कैसे और किस जल से किया जाए यह तुमसे ज्यादा हम जानते है."
"पर शायद आप यह नहीं जानते की अर्ध सहस्र किरात आपके नगर को घेर कर बैठे है."धनगुप्त ने कहा.
"फिर हम मरते दम तक आपसे लडेंगे."उग्ररूप बोला.
नगराध्यक्ष ने रोका.
"आप क्रोध न करें धर्माधिकारी,आप के लिए और समस्त शास्त्र सम्मत कार्यों के लियें हमने यहाँ से कुछ दूरी पर कूप खुदवाने का कार्य काफी पहले से आरम्भ कर दिया था.पर उसमे अभी पानी नहीं निकला है.तब तक वापी का जल पूरी तरह आपके कार्यों के लिए प्रयुक्त होगा.किरात युवक हमारी आप लोगों से कोई शत्रुता नहीं है आप अपने और पशुओं के लिए आपके कूप से पानी ले सकते है."नगराध्यक्ष ने निर्णय दिया.
धर्माधिकारी के चेहरे पर अप्रसन्नता झलक रही थी.सभी युवकों को छोड़ दिया गया .किरातों की घेराबंदी समाप्त होने से सबने राहत महसूस की.धनगुप्त ने कारवाँ को चार दिन विश्राम देने को कहा.तब तक स्थानीय व्यापारियों से कुछ व्यापार किया जाना था.
"नगराध्यक्ष...बधाई..!नए कूप में मीठा जल निकल आया है.भरपूर है."सेवक ने सूचना दी.
धर्माधिकारी के चेहरे पर प्रसन्नता और दंभ उमड़ आया."ईश्वर का चमत्कार देखिये...आपने कूप के जल को अस्पृश्यों को अनुमत किया तो नए कूप में मीठा और अथाह जल निकल आया...नगराध्यक्ष.अब हम किरात कूप का जल कभी प्रयुक्त नहीं करेंगे...और हाँ,आप नवीन कूप की सुरक्षा व्यस्था शीघ्र कर दें..नए कूप का नाम हम भद्र कूप रखते है..और हमारी तरफ से एक शिलालेख महाराज सिन्धुराज परमार की राजाज्ञा में स्थापित किया जाए.आज से धार्मिक कार्यों में केवल भद्र कूप का जल प्रयुक्त किया जाएगा."
उग्ररूप २१ वर्ष का किरात युवक था.उसके पिता सात किरात कबीलों के नेता थे.और पंद्रह वर्ष पहले विशाल तुरुष्क सेना से अपने कबीले के लोगों की रक्षा करते हुए मारे गए थे.इसलिए उग्ररूप का किरातों में बड़ा सम्मान था.वह उड़ती चिडिया पर अचूक निशाना लगा सकता था.आर्यों से कूप को मुक्त कराने के बाद कबीले की कितनी युवतियां उस पर न्योच्छावर होने को तैयार थी.पर वह श्यामला पर मोहित था.किरातों के रिवाज के अनुसार उसे श्यामला के पिता को दस अलग अलग शिकार भेंट करने थे.उसमे से पिछले दो महीनों में नौ शिकार उसके द्वारा भेंट किये जा चुके थे.आज वह नर चिंकारा का शिकार कर अपने होने वाले ससुर को भेंट कर श्यामला का हाथ मांगने वाला था.वह सुबह से अपने साथियों के साथ आखेट पर निकला था.आज का आखेट बहुत अच्छा रहा था.एक मृग तीन खरगोश,और दस तीतर.और अब उसका नर चिंकारा पर निशाना अचूक रहा.थोडी देर में आखेट में मिली सफलता से उत्साहित आठ किरात युवक एक साथ होकर मजरे की ओर चल पड़े.तभी उन्होंने देखा कि दक्षिण कि ओर सिंध से आने वाले मार्ग पर धूल का गुबार उठ रहा था.शायद रेत का तूफ़ान...नहीं..?नगाडों और तुरही कि दूर से आती आवाजों ने उनके दिल में भार सा रख दिया था.क्या कोई आक्रमण ..?उसने जीवन में कभी विशाल सेना का आक्रमण नहीं देखा था.उसके पिता कि यादों ने मन को और भारी कर दिया.पर उसने सुना था कि जिस मार्ग से विशाल सेनाएं गुजरती है तो वे आस पास के गाँवों कि खाद्य सामग्री लूट लेती है.युवक युवतियों को दास बना लेती है...और बड़ों और बच्चों का कत्ल कर देती है.और सेना तो उनके मजरे के रास्ते से आ रहीं थी.वह चिंतित हो उठा और सभी तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगे.
उधर तुरुष्क सेना के लगभग पचास अश्वारोही गाँव की ओर बढ़ गए.उन्होंने देखते देखते गाँव में घरों पर जलती मशालें फैंकनी शुरू कर दी.ऐसा इसलिए किया गया की गाँव के लोग घरों में छुप न सकें.सारा गाँव धू धू कर जलने लगा.सब लोग घरों से बाहर आ गए.जो न आ सके वे भीतर ही जल गए.वृद्धों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया.जवान औरतों और लड़कियों को हाथ पर नीला कपडा बाँध कर दास बनाया गया.जवान लड़कों को भी गुलाम बना लिया गया.और सब लोग उस दिशा में बढ़ने लगे जिधर से सेना गुजर रही थी.
उग्ररूप और साथियों ने अश्वारोहियों को दूर से लोगों को हांकते हुए आते देखा तो वे वृक्षों की ओट में हो गए.और उसने देखा श्यामला सहित उसके गाँव की युवतियों को भाले की नोक पर बेरहमी से आगे धकेला जा रहा था.उसकी समझ में आ गया की सब कुछ तबाह हो चुका है.अब गाँव में न तो कोई जिन्दा बचा होगा और न कुछ शेष बचा होगा.उसके कई साथी अब तुरुष्कों के गुलाम थे.
"शत्रु से मुकाबला कर मर जाना श्रेष्ठ है,"उसने सोचा.फिर उसके मन में आया यह तो आत्म हत्या होगी.उनका पीछा किया जाये और अवसर मिलने पर अपने साथियों को छुडाया जाए.पर थोडी देर में ये लोग मुख्य सेना से मिल जायेंगे.फिर तो कुछ भी करना असंभव हो जाएगा.इन विचारों से कुछ दूरी बनाते हुए वे भी साथ चलने लगे.
"कई काफिर हमारे गुलाम हो गए है.पर सुलतान कल बुत शिकन की उपाधि लेंगे.कल कई काफिरों का कत्ले आम करने का हुकुम मिला है."अश्वारोहियों में एक ने कहा.
"पर वह शहर तो अभी दूर होगा."दूसरे ने पूछा.
"नहीं ज्यादा दूर नहीं है.पर कल जुम्मे की नमाज के बाद यह नेक काम किया जाएगा.आज रात को ही घेरा डाल देंगे."
"उनको खबर हो गई तो शायद हमें कुछ भी न मिले."
"नहीं, अभी तक एक भी व्यक्ति को जिंदा नहीं छोडा गया है जो किसी को खबर कर सके."
उग्ररूप को अब समझ में आरहा था की उसने जो देखा है वह तो शुरुआत भर है.इस इलाके में अब कुछ भी नहीं बचना है.बच्चों और बूढों के कत्ल.घरों में आग लगा देना.कितने क्रूर हो सकते है ये राक्षस!ये कुछ नहीं देखते की हम किरात है या कोई ओर.बस इन्हें तो केवल बर्बादी करनी आती है.हमारी इनसे कोई दुश्मनी नहीं,फिर भी ये हमें क्यूँ मारते और गुलाम बनाते है.क्या सभ्य लोगों में इतनी भी इंसानियत नहीं है.हम जंगली लोग अकारण एक पशु का वध नहीं करते और ये कत्ले आम को नेक काम कहते हैं.अच्छा है हम जंगली है और हमारा कोई धर्म नहीं है.काश प्रकृति दावानल बन कर इन सबको भस्म कर दे.उसका दिल फटा जा रहा था.अपने आप को इतना कमजोर और असहाय कभी अनुभव नहीं किया था.उसका मन रोने को कर रहा था.वह चलते चलते रुक गया.और झाडी की ओट से श्यामला को जाते हुए देखने लगा जिसकी बांह में नीला कपडा बंधा था.वह आज शाम को उसकी होने वाली थी.पर आज उसके वृद्ध पिता की लाश तबाह हुए गाँव में कहीं पड़ी होगी.
उसकी आँखों में अश्रु धार बह चली.
उसने सब साथियों को कहा-"मित्रों,हम अपना सब कुछ खो बैठे है.पर हमें यह प्रयत्न करना है कि हम किरातों के जितने कबीलों ,गाँवों और लोगों को बचा सकें बचाएं.हम सब अलग अलग कबीलों को आक्रमण की सूचना पहुँचाएँगे. हम जितने तेज पहुँच सके उतना अधिक समय मिलेगा.सब किरातों को उग्ररूप की तरफ से यह सूचना दें कि तुरुष्क आक्रमण से बचने के लिए सभी लोग जितना हो सके दूर वनों में चले जाएं.और अपने खाद्य भंडारों को आग लगा दें ताकि शत्रु इसका उपयोग न कर सकें.वन देवी हम सबकी रक्षा करे."
फिर सब अलग दिशाओं में दौड़ लिए.उग्ररूप किरात कूप नगर की ओर जा रहा था.आज वह इतना तेज दौड़ रहा था जितना मृगया में भी कभी नहीं दौड़ा था.थोडी देर में वह नगराध्यक्ष को को सब बता रहा था.
सभी मंदिरों के गर्भ गृह से मूर्तियाँ धनगुप्त के कारवाँ की गाड़ियों में लादी गई.नगर के लोगों ने जोकुछ साथ ले सकते थे लेकर नगर छोड़ दिया.उग्ररूप को साथ चलने को कहा तो उसने इनकार कर दिया.वह तुरुष्कों का सामना करना चाहता था.
"तुम मूर्ख हो युवक.तुम उनका सामना नहीं कर पाओगे."
"जानता हूँ.पर आस पास जल का एक मात्र स्रोत किरात कूप ही है.शत्रु यहाँ से पानी लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकता.मैंने अगर उन्हें सुबह तक रोक लिया तो कई जाने बच सकती है."
"मैं भी इससे सहमत हूँ.सार्थवाह हमारा कर्तव्य आपकी रक्षा करना है और वह हम यहाँ पर शत्रु को रोक कर बेहतर कर सकते है."अतिरथ ने कहा.
नगर सेनापति भी सहमत था.
"पर यह तो जान बूझ कर अपने प्राण देना हुआ."धर्माधिकारी ने कहा.
"अगर हम आपके साथ भागते है,तो यह कायरता होगी."नगर सेनापति ने कहा.
सभी लोगों ने प्रस्थान किया.
उस रात तीन सौ के लगभग सैनिको ने विशाल तुरुष्क सेना को अपने तीरों से रोके रखा.रात भर आक्र्न्ताओं के सैनिक और अश्व पानी के लिए तरसते रहे.सुबह होते होते उग्ररूप अतिरथ और नगर सेनापति सहित सभी रक्षक मारे गए.आक्रमण कारियों को नगर में कत्लेआम के लिये कोई जीवित नहीं मिला तो उन्होंने मंदिर की एक एक मूर्ती को तोड़ दिया.पूरे नगर का ध्वंस कर दिया.
कई वर्षों बाद भद्र कूप के शिलालेख में वर्णित किया गया-किरात कूप नगर की तुरुष्कों से रक्षा करते हुए क्षत्रिय उग्ररूप के नेतृत्व में तीन सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए.आज एक चबूतरे के ऊपर जिस पर शिला लेख को मूर्ति के रूप में स्थापित किया गया है की स्थानीय आदिवासी झुजार देवता के रूप में पूजा करते है.
"अब चलना नहीं है क्या?' मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जगाया.किराडू मंदिर के ध्व्न्सावशेशों में एक भग्न मंडप के खम्भे से पीठ टिकाये सोचते सोचते मैं जाने कहाँ खो गयाथा.
"लगता है आँख लग गई."मैंने कहा.
"आप भी हद करते है.कितनी अच्छी जगह थी और आप है की यहाँ भी सोते ही रहे."
"कोई बात नहीं,यह जगह मेरे पहले से देखी हुई है.अब चलो."
हम दोनों गाड़ी की और बढ़ गए.बच्चे वहां इन्तजार कर रहे थे.
photo courtesy- CarbonNYC
सार्थवाह धनगुप्त ने अपने कारवाँ पर नजर डाली.टीले की ऊंचाई से वह अपनी बैलगाडियों की पंक्ति का अंतिम छोर अच्छी तरह से देख पा रहा था.वह वर्षों से अपने कारवाँ के साथ व्यापार करता आ रहा था.पर इस मार्ग से कई बरसों बाद गुजर रहा था.आज का मार्ग कुछ अधिक ही दुर्गम जान पड़ रहा था.
"रक्षक सावधान है!"काफिले के आगे चलते घुड़सवारों की रक्षापंक्ति में मुख्य रक्षक अतिरथ ने जम्हाई लेते हुए अस्पष्ट से स्वरमे कहा.
"रक्षक सावधान है!"थोडी दूर पीछे चलते रक्षकों ने यंत्रवत दोहराया.
"रक्षक सावधान है!"का स्वर घोष हर पीछे वाला रक्षक दोहरा रहा था और इस तरह से यह अंतिम छोर तक पहुँच रहा था.
"कारवाँ सुरक्षित है!" अंतिम रक्षक ने कहा और अब यह नया घोष मंथर गति से पीछे से आगे बढ़ने लगा.
पिछले पंद्रह दिनों से यह कारवाँ कुछ इसी तरह से आगे बढ़ रहा था.सिंध से भृगु कच्छ का ढाई महीनों का सफ़र सबसे कठिन यात्राओं में गिना जाता था.सिंध कि सौदे बाजी में मशहूर चीन का रेशम मिश्र के हाथी दांत विदेशी शराब,आबनूस औए सोना चांदी सब के सब बेश कीमती सामान काफी अच्छे सौदे से हासिल किये थे.वर्षा ऋतू आरम्भ होने से पहले भृगु कच्छ पहुँचने पर इनके अच्छे सौदे होने कि सम्भावना थी.वहां मानसून से पहले समुद्री मार्ग से कोई यात्रा संभव नहीं थी.और इस रास्ते व्यापरी कम जाना पसंद करते थे.धनगुप्त कि गिनती साहसी सार्थवाहों में होतीं थीं और वह इस अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था. किरात कूप नगर अब व्यापारियों और ब्राह्मणों का नगर था.यहाँ पर भी देसी गुग्गुल पन्ना और ताँबा स्थानीय व्यापारियों द्वारा काफी सस्ते दामों में बेचा जाता था.तो वह भी खरीद कर आगे ले जाया जा सकता था.
मरू प्रदेश का यह क्षेत्र अठारह कोस में फैला हुआ था.कारवाँ के अनुभवी लोग इसको एक दिन में पार करना ही सुरक्षित समझते थे.एक तो इस क्षेत्र में पानी नहीं था,दूसरा यहाँ किरात बसते थे जिनके बारें में बड़ी भयानक बातें सुनी गईं थीं.
वे अपने आप को किसी भी जानवर के रूप में बदल सकते थे.
वे जादू टोना जानते थे और धनुर्विद्या और प्रस्तर प्रक्षेपण में अत्यंत दक्ष होते थे.और भी जाने कितनीं बातें...कितनी सही कितनी गलत कुछ पता नहीं.
धनगुप्त उनसे सामना न होने की प्रार्थना ही कर सकता था.
फिर दक्षिण पश्चिम दिशा से रेत का बवंडर उठते दिखाई दिया.जो भयानक तरीके से उनकी और आता दिखाई पड़ रहा था.
"श्रीदास,रेत का तूफ़ान आ रहा है.हमें कारवाँ रोक देना चाहिए."धनगुप्त ने साथी वणिक को कहा.
टीले से नीचे उतरने के बाद काफी बड़ा मैदान रुकने के लिए उपयुक्त स्थान था.वहां पर गोल घेरे में बैलगाडियां और ऊँट गाडियाँ खड़ी कर दी गईं.रक्षकों ने भी अपने आप को फैला लिया.
थोडी देर बाद ऐसा तूफ़ान शुरू हुआ जिसमे अपना हाथ भी सुझाई न दे.और उसने रुकने का नाम न लिया.
कुछ गाड़ियों पर रहने के तम्बू लगे थे,कुछ में पशुओं के चारा और बाकी गाड़ियों पर सामान के गट्ठर थे जो चमडे के पालों से ढंके थे.
धनगुप्त और श्रीदास ने ऊँट गाडी के ऊपर बनाए बड़े से तम्बू में शरण ले रखी थी. आपस में बात करते करते धनगुप्त थोडी थोडी देर में तम्बू से बाहर झाँक कर अंधड़ का जायजा ले रहा था.जैसे जैसे समय बीतता जा रहा था उसकी व्यग्रता और चिंता बढती जा रही थी.वह उठकर तम्बू से बाहर आगया शायद यह सोच कर कि कदाचित ऐसा करने से तूफ़ान रुक जाए पर एक तेज झपेटे ने उसकी आँखों में काफी रेत भर दी.वह फिर तम्बू के भीतर आगया.
"श्रीदास, लगता है आज प्रकृति हमारे विपरीत संचालित हो रही है.हमें यह क्षेत्र रात में पार करना पड़ सकता है,जो सुरक्षित तो नहीं है पर इसके सिवाय को चारा नहीं है."धनगुप्त ने कहा.
"पर अभी तो तूफ़ान ऐसा चल रहा है कि दिन में भी नहीं बढ़ पा रहे है."
"मौसम ठंडा होते तूफ़ान धीमा पड़ जाएगा."
"और हम रात में यहां रुक जाएँ तो?"श्रीदास की अनुभव हीनता उसकी बातों में दिखाई पड़ रही थी.
"नहीं,ऐसा नहीं कर सकते कल के दिन के लिए हमारे पास पानी नहीं बचेगा."धनगुप्त ने सांस छोड़ते हुए कहा.
ढेर सारी चिंताओं के बीच में अंधड़ की गति कुछ कम हुई.रात्री के प्रथम प्रहर बीतते अंधड़ रुक चुका था.अंधड़ और अँधेरे का परिणाम था कि मार्ग का कोई पता नहीं चल रहा था.आकाश में रेत पसरी होने से तारों से भी दिशा का अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.अब सार्थवाह कि विगत स्मृतियों और अनुभव के सहारे ही कारवाँ को आगे बढ़ना था.
मध्य रात्रि तक चलने के पश्चात मार्ग के दायीं और पहाडियों की श्रृंखला दिखाई दी.धनगुप्त ने आँखे फाड़ करके यह सुनिश्चित किया कि जो दिख रहा है वह भ्रम नहीं है.मरू प्रदेश में वे लोग वहां पहुँच गए थे जहां पानी मिल सकता था.
पहाडियों के बीच छोटा सा नगर बसा था.द्वार पर रक्षक पहरा दे रहे थे.
"कौन है?"रक्षक ने कठोर स्वर में पूछा.
"मैं धनगुप्त हूँ,पुरुषपुर की एक वणिज श्रेणी का श्रेष्ठी और सिंध से आए एक कारवाँ का सार्थवाह.अपना कर लो और हमें भीतर आने दो."धनगुप्त ने कहा.
"कारवाँ कितना बड़ा है?"रक्षक ने पूछा.
"एक सौ बीस गाडियां है.डेढ़ सौ रक्षक और दो सौ अन्य व्यापारी और सेवक है."
"दो सौ सिक्के."
धनगुप्त ने कमर में बंधी दो सिक्कों की थैलियाँ निकल कर रक्षक को दे दी.
"यहाँ धर्मशाला होगी?"
"आगे जाकर बाई ओर मंदिर के पास."
थोडी देर में धर्मशाला के पास के मैदान में गाडियाँ पंक्तिबद्ध खड़ी थी.और सभी लोग अपने अनुकूल स्थानों पर निद्रा की गोद में विश्राम कर रहे थे.
अचानक तीव्र कोलाहल सुन कर धनगुप्त की आँख खुल गई.पहाडों से प्रस्तरों और तीरों की बौछार हो रही थी.
"सावधान!किरातों ने आक्रमण कर दिया है..."
धनगुप्त धर्म शाला से बाहर निकला ही था कि एक क्षिप्त प्रस्तर तेज गति से उसके कान के पास से गुजरता हुआ खम्भे से जा टकराया. खम्भे से चिंगारियां निकली.चारों तरफ अफरा तफरी मची हुई थी.नगर निवासियों ने अपने घरों के द्वार बंद कर दिए. शहर के रक्षक किरातों का मुकाबला नहीं कर पा रहे थे.
"अतिरथ,अपने रक्षकों को सावधान कर प्रत्याक्रमण करने को कहो."धनगुप्त ने मुख्य रक्षक को चिल्लाते हुए कहा.
थोडी देर में कारवाँ कि रक्षक सेना नगर रक्षकों के साथ मिल कर लड़ने लगी.धनगुप्त ने श्रेणी के व्यापारियों को भी शस्त्र सँभालने को कहा.नगर कि सेना इस हमले के लिए तैयार नहीं थी.और किरातों के ऐसे सुनियोजित हमले कि उम्मीद किसी ने नहीं की थी.मुख्य रक्षक सतर्क निगाहों से हमले की दिशा भांपने का प्रयास कर रहा था.तीर और पत्थर सभी दिशाओं से आरहे थे.उत्तरी पहाडी से बार बार ऊंची आवाजे आरही थी.उसको अनुमान लगाने में देर नहीं लगी की किरातों का आक्रमण वहीँ से ही नियंत्रित किया जा रहा है.कारवाँ की सुरक्षा करते ऐसे कई अचानक हमले झेलने का अनुभव उसके काम आ रहा था.उसने अपने दक्ष रक्षकों की एक टुकडी को शीघ्रता से निर्देश दिए.थोडी देर में पन्द्रह रक्षकों की टुकडी दीवारों और पत्थरों की ओट में उत्तरी पहाडी की ओर बढ़ गई.उन लोगों ने पहाडी पर चार किरात युवकों को घेर लिया और बंदी बनाते हुए हमला रोकने को कहा.हमला रुक गया और इधर भोर का उजाला फैलने लगा.
चारों युवकों को नगराध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया गया.चार पांच सौ किरात अभी भी नगर पर घेरा डाले पहाडियों पर स्थित थे.उनका नेता उग्ररूप बंदी बनाया जा चुका था इसलिए हमला रोक दिया गया था.पर अगर बंदियों को नुक्सान पहुँचाया जाता तो हमला फिर किया जाना अवश्यंभावी था.
"किरात युवक, यह अनावश्यक आक्रमण क्यों की गया?"नगराध्यक्ष ने पूछा.
"आपने हमारे जलस्रोत पर अनुचित अधिकार कर रखा है."उग्ररूप ने कहा.
"यह सही नहीं है.यह हमारा नगर है.और जलस्रोत भी हमारा है.इस पर तुम कैसे अधिकार जता सकते हो ?"नगराध्यक्ष ने कहा.
"चालीस बर्ष पहले आपके कारवाँ यहाँ से गुजरते थे और हमारे कूप से पानी ले जाने की प्रार्थना करते थे.और फिर आपने अपने मंदिरों में पूजा के लिए यहाँ से पानी लेना आरम्भ किया.और अब आपने हमारे जलकूप के चारों और भी दीवार बनादी.अब हम अपने जलकूप के उपयोग से वंचित का दिए गए है."उसने उत्तर दिया.
"तुम कदाचित सही नहीं हो युवक.यह नगर परमार शासकों की सुरक्षा में बरसों से है.इस कूप पर किरात लोगों के अधिकार में होने अथवा बसने का कोई प्रमाण नहीं है."नगराध्यक्ष ने शांत स्वर में कहा.
"इसका प्रमाण है इसका नाम ...किरात कूप !जो अब आपके नगर का भी नाम है.रही हमारे बसने की बात तो हम प्रकृति पुत्र है.हम सारी प्रकृति में बसते है.और हम आवश्यकतानुसार ही यहाँ आते है."उग्ररूप ने दृढ़ता से कहा.
"ठीक है युवक हम तुम लोगों को पश्चिमी द्वार से पानी के लिए आने की अनुमति दे सकते है."
"नहीं, यह नहीं हो सकता है !हम मंदिर में वह जल नहीं चढा सकते जहाँ से अस्पृश्य किरात पानी भरें.हमने सिन्धुराज से मंदिरों की पवित्रता बनाए रखने की विनती की थी तभी यह दीवार बनाई गई है."मंदिरों के धर्माधिकारी ने रोष भरे स्वर में आपत्ति प्रकट की.
"नगराध्यक्ष अनुमति दे तो में कुछ कहूं."धनगुप्त जो अब तक चुप था, बोला.
"अवश्य कहो सार्थवाह."
"पानी कभी अपवित्र नहीं हो सकता है ,हमने अपनी दुर्गम यात्राओं से से यही सीखा है.और फिर इस मरू प्रदेश में तो यह अमृत है..और.."
धर्माधिकारी का चेहरा रोष से तमतमा उठा,"जगह जगह की यात्राओं पर जाने वाले वणिक शास्त्रों के अनुसार अपवित्र होते है...देव पूजन कैसे और किस जल से किया जाए यह तुमसे ज्यादा हम जानते है."
"पर शायद आप यह नहीं जानते की अर्ध सहस्र किरात आपके नगर को घेर कर बैठे है."धनगुप्त ने कहा.
"फिर हम मरते दम तक आपसे लडेंगे."उग्ररूप बोला.
नगराध्यक्ष ने रोका.
"आप क्रोध न करें धर्माधिकारी,आप के लिए और समस्त शास्त्र सम्मत कार्यों के लियें हमने यहाँ से कुछ दूरी पर कूप खुदवाने का कार्य काफी पहले से आरम्भ कर दिया था.पर उसमे अभी पानी नहीं निकला है.तब तक वापी का जल पूरी तरह आपके कार्यों के लिए प्रयुक्त होगा.किरात युवक हमारी आप लोगों से कोई शत्रुता नहीं है आप अपने और पशुओं के लिए आपके कूप से पानी ले सकते है."नगराध्यक्ष ने निर्णय दिया.
धर्माधिकारी के चेहरे पर अप्रसन्नता झलक रही थी.सभी युवकों को छोड़ दिया गया .किरातों की घेराबंदी समाप्त होने से सबने राहत महसूस की.धनगुप्त ने कारवाँ को चार दिन विश्राम देने को कहा.तब तक स्थानीय व्यापारियों से कुछ व्यापार किया जाना था.
"नगराध्यक्ष...बधाई..!नए कूप में मीठा जल निकल आया है.भरपूर है."सेवक ने सूचना दी.
धर्माधिकारी के चेहरे पर प्रसन्नता और दंभ उमड़ आया."ईश्वर का चमत्कार देखिये...आपने कूप के जल को अस्पृश्यों को अनुमत किया तो नए कूप में मीठा और अथाह जल निकल आया...नगराध्यक्ष.अब हम किरात कूप का जल कभी प्रयुक्त नहीं करेंगे...और हाँ,आप नवीन कूप की सुरक्षा व्यस्था शीघ्र कर दें..नए कूप का नाम हम भद्र कूप रखते है..और हमारी तरफ से एक शिलालेख महाराज सिन्धुराज परमार की राजाज्ञा में स्थापित किया जाए.आज से धार्मिक कार्यों में केवल भद्र कूप का जल प्रयुक्त किया जाएगा."
उग्ररूप २१ वर्ष का किरात युवक था.उसके पिता सात किरात कबीलों के नेता थे.और पंद्रह वर्ष पहले विशाल तुरुष्क सेना से अपने कबीले के लोगों की रक्षा करते हुए मारे गए थे.इसलिए उग्ररूप का किरातों में बड़ा सम्मान था.वह उड़ती चिडिया पर अचूक निशाना लगा सकता था.आर्यों से कूप को मुक्त कराने के बाद कबीले की कितनी युवतियां उस पर न्योच्छावर होने को तैयार थी.पर वह श्यामला पर मोहित था.किरातों के रिवाज के अनुसार उसे श्यामला के पिता को दस अलग अलग शिकार भेंट करने थे.उसमे से पिछले दो महीनों में नौ शिकार उसके द्वारा भेंट किये जा चुके थे.आज वह नर चिंकारा का शिकार कर अपने होने वाले ससुर को भेंट कर श्यामला का हाथ मांगने वाला था.वह सुबह से अपने साथियों के साथ आखेट पर निकला था.आज का आखेट बहुत अच्छा रहा था.एक मृग तीन खरगोश,और दस तीतर.और अब उसका नर चिंकारा पर निशाना अचूक रहा.थोडी देर में आखेट में मिली सफलता से उत्साहित आठ किरात युवक एक साथ होकर मजरे की ओर चल पड़े.तभी उन्होंने देखा कि दक्षिण कि ओर सिंध से आने वाले मार्ग पर धूल का गुबार उठ रहा था.शायद रेत का तूफ़ान...नहीं..?नगाडों और तुरही कि दूर से आती आवाजों ने उनके दिल में भार सा रख दिया था.क्या कोई आक्रमण ..?उसने जीवन में कभी विशाल सेना का आक्रमण नहीं देखा था.उसके पिता कि यादों ने मन को और भारी कर दिया.पर उसने सुना था कि जिस मार्ग से विशाल सेनाएं गुजरती है तो वे आस पास के गाँवों कि खाद्य सामग्री लूट लेती है.युवक युवतियों को दास बना लेती है...और बड़ों और बच्चों का कत्ल कर देती है.और सेना तो उनके मजरे के रास्ते से आ रहीं थी.वह चिंतित हो उठा और सभी तेज क़दमों से आगे बढ़ने लगे.
उधर तुरुष्क सेना के लगभग पचास अश्वारोही गाँव की ओर बढ़ गए.उन्होंने देखते देखते गाँव में घरों पर जलती मशालें फैंकनी शुरू कर दी.ऐसा इसलिए किया गया की गाँव के लोग घरों में छुप न सकें.सारा गाँव धू धू कर जलने लगा.सब लोग घरों से बाहर आ गए.जो न आ सके वे भीतर ही जल गए.वृद्धों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया.जवान औरतों और लड़कियों को हाथ पर नीला कपडा बाँध कर दास बनाया गया.जवान लड़कों को भी गुलाम बना लिया गया.और सब लोग उस दिशा में बढ़ने लगे जिधर से सेना गुजर रही थी.
उग्ररूप और साथियों ने अश्वारोहियों को दूर से लोगों को हांकते हुए आते देखा तो वे वृक्षों की ओट में हो गए.और उसने देखा श्यामला सहित उसके गाँव की युवतियों को भाले की नोक पर बेरहमी से आगे धकेला जा रहा था.उसकी समझ में आ गया की सब कुछ तबाह हो चुका है.अब गाँव में न तो कोई जिन्दा बचा होगा और न कुछ शेष बचा होगा.उसके कई साथी अब तुरुष्कों के गुलाम थे.
"शत्रु से मुकाबला कर मर जाना श्रेष्ठ है,"उसने सोचा.फिर उसके मन में आया यह तो आत्म हत्या होगी.उनका पीछा किया जाये और अवसर मिलने पर अपने साथियों को छुडाया जाए.पर थोडी देर में ये लोग मुख्य सेना से मिल जायेंगे.फिर तो कुछ भी करना असंभव हो जाएगा.इन विचारों से कुछ दूरी बनाते हुए वे भी साथ चलने लगे.
"कई काफिर हमारे गुलाम हो गए है.पर सुलतान कल बुत शिकन की उपाधि लेंगे.कल कई काफिरों का कत्ले आम करने का हुकुम मिला है."अश्वारोहियों में एक ने कहा.
"पर वह शहर तो अभी दूर होगा."दूसरे ने पूछा.
"नहीं ज्यादा दूर नहीं है.पर कल जुम्मे की नमाज के बाद यह नेक काम किया जाएगा.आज रात को ही घेरा डाल देंगे."
"उनको खबर हो गई तो शायद हमें कुछ भी न मिले."
"नहीं, अभी तक एक भी व्यक्ति को जिंदा नहीं छोडा गया है जो किसी को खबर कर सके."
उग्ररूप को अब समझ में आरहा था की उसने जो देखा है वह तो शुरुआत भर है.इस इलाके में अब कुछ भी नहीं बचना है.बच्चों और बूढों के कत्ल.घरों में आग लगा देना.कितने क्रूर हो सकते है ये राक्षस!ये कुछ नहीं देखते की हम किरात है या कोई ओर.बस इन्हें तो केवल बर्बादी करनी आती है.हमारी इनसे कोई दुश्मनी नहीं,फिर भी ये हमें क्यूँ मारते और गुलाम बनाते है.क्या सभ्य लोगों में इतनी भी इंसानियत नहीं है.हम जंगली लोग अकारण एक पशु का वध नहीं करते और ये कत्ले आम को नेक काम कहते हैं.अच्छा है हम जंगली है और हमारा कोई धर्म नहीं है.काश प्रकृति दावानल बन कर इन सबको भस्म कर दे.उसका दिल फटा जा रहा था.अपने आप को इतना कमजोर और असहाय कभी अनुभव नहीं किया था.उसका मन रोने को कर रहा था.वह चलते चलते रुक गया.और झाडी की ओट से श्यामला को जाते हुए देखने लगा जिसकी बांह में नीला कपडा बंधा था.वह आज शाम को उसकी होने वाली थी.पर आज उसके वृद्ध पिता की लाश तबाह हुए गाँव में कहीं पड़ी होगी.
उसकी आँखों में अश्रु धार बह चली.
उसने सब साथियों को कहा-"मित्रों,हम अपना सब कुछ खो बैठे है.पर हमें यह प्रयत्न करना है कि हम किरातों के जितने कबीलों ,गाँवों और लोगों को बचा सकें बचाएं.हम सब अलग अलग कबीलों को आक्रमण की सूचना पहुँचाएँगे. हम जितने तेज पहुँच सके उतना अधिक समय मिलेगा.सब किरातों को उग्ररूप की तरफ से यह सूचना दें कि तुरुष्क आक्रमण से बचने के लिए सभी लोग जितना हो सके दूर वनों में चले जाएं.और अपने खाद्य भंडारों को आग लगा दें ताकि शत्रु इसका उपयोग न कर सकें.वन देवी हम सबकी रक्षा करे."
फिर सब अलग दिशाओं में दौड़ लिए.उग्ररूप किरात कूप नगर की ओर जा रहा था.आज वह इतना तेज दौड़ रहा था जितना मृगया में भी कभी नहीं दौड़ा था.थोडी देर में वह नगराध्यक्ष को को सब बता रहा था.
सभी मंदिरों के गर्भ गृह से मूर्तियाँ धनगुप्त के कारवाँ की गाड़ियों में लादी गई.नगर के लोगों ने जोकुछ साथ ले सकते थे लेकर नगर छोड़ दिया.उग्ररूप को साथ चलने को कहा तो उसने इनकार कर दिया.वह तुरुष्कों का सामना करना चाहता था.
"तुम मूर्ख हो युवक.तुम उनका सामना नहीं कर पाओगे."
"जानता हूँ.पर आस पास जल का एक मात्र स्रोत किरात कूप ही है.शत्रु यहाँ से पानी लिए बिना आगे नहीं बढ़ सकता.मैंने अगर उन्हें सुबह तक रोक लिया तो कई जाने बच सकती है."
"मैं भी इससे सहमत हूँ.सार्थवाह हमारा कर्तव्य आपकी रक्षा करना है और वह हम यहाँ पर शत्रु को रोक कर बेहतर कर सकते है."अतिरथ ने कहा.
नगर सेनापति भी सहमत था.
"पर यह तो जान बूझ कर अपने प्राण देना हुआ."धर्माधिकारी ने कहा.
"अगर हम आपके साथ भागते है,तो यह कायरता होगी."नगर सेनापति ने कहा.
सभी लोगों ने प्रस्थान किया.
उस रात तीन सौ के लगभग सैनिको ने विशाल तुरुष्क सेना को अपने तीरों से रोके रखा.रात भर आक्र्न्ताओं के सैनिक और अश्व पानी के लिए तरसते रहे.सुबह होते होते उग्ररूप अतिरथ और नगर सेनापति सहित सभी रक्षक मारे गए.आक्रमण कारियों को नगर में कत्लेआम के लिये कोई जीवित नहीं मिला तो उन्होंने मंदिर की एक एक मूर्ती को तोड़ दिया.पूरे नगर का ध्वंस कर दिया.
कई वर्षों बाद भद्र कूप के शिलालेख में वर्णित किया गया-किरात कूप नगर की तुरुष्कों से रक्षा करते हुए क्षत्रिय उग्ररूप के नेतृत्व में तीन सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए.आज एक चबूतरे के ऊपर जिस पर शिला लेख को मूर्ति के रूप में स्थापित किया गया है की स्थानीय आदिवासी झुजार देवता के रूप में पूजा करते है.
"अब चलना नहीं है क्या?' मेरी धर्मपत्नी ने मुझे जगाया.किराडू मंदिर के ध्व्न्सावशेशों में एक भग्न मंडप के खम्भे से पीठ टिकाये सोचते सोचते मैं जाने कहाँ खो गयाथा.
"लगता है आँख लग गई."मैंने कहा.
"आप भी हद करते है.कितनी अच्छी जगह थी और आप है की यहाँ भी सोते ही रहे."
"कोई बात नहीं,यह जगह मेरे पहले से देखी हुई है.अब चलो."
हम दोनों गाड़ी की और बढ़ गए.बच्चे वहां इन्तजार कर रहे थे.
photo courtesy- CarbonNYC
Sunday, May 2, 2010
चाय री थडी अर चिंतन
(प्रस्तुत आलेख २३ अप्रैल २०१० को नवभारत टाइम्स के मुंबई संस्करण में किंचित परिवर्तनों के साथ प्रकाशित)
कैवण री बात कोनी कै अठे बत्ती गर्मी पड़ण लागगी है. सैन होवण सूं बार रो मामलो हो रयो है.इण बिच्चे लारले दो दिनां सूं आंधी चाल री है.ऊपर सूं तो गर्मी बरसतोड़ी नी दिखे पर जमीन सूं झाळ वैड़ी री वैड़ी है. डूबतोड़े सूरज ने आज मैं आंधी रै माँय देखियो. धूडै सूं भरिज्योड़ो. शैतान बच्चे रे ज्यूं कैव्तो के अबार तो जावण रो टैम है, काल पाछो आ'र बताऊंला, इण सूं बत्ती गर्मी ले'र आउंला. मारवाड़ में इण मौसम में गर्मी री कईं बात करणी. अठै जोधपुर में प्रसासन एक काम चोखो करयो. स्कूलां में टाबरां रै जल्दी छुट्टी रा आदेश जारी कर दीना.कई ठा डर भी हो सकै कै कठै तबीयत दूजी ख़राब होयगी तो जवाब देणो भरी पड़ जावैला.
स्कूलां सूं याद आयो कै थारी भतीजी रो एडमीसन चोखी भणाई- पढाई वाळी स्कूल में होय ग्यो है. मन्नै सब बधाई अर थारी भतीजी ने आसीस दे रिया है. स्कूल में हिंदी पढावण वाळा बैन्जी जद निप वाळो पैन लावन रो आदेस फरमायो तो मैं बौत राजी व्हियो.मारै बाळपणै री याद ताजी होयगी. काइ चालतो वा पैन ! माखण वै ज्यूं. राइटिंग जोरदार जमती.आ बात दूजी है कै कंप्यूटर माथै लिखण रै जमाने में आज राइटिंग नै कुण पूछै. खैर थूं सुणा. कीकर चाल री है गाडी?
घणा टैम पछै एकर जालोरी गेट वाळी चाय री थडी याद आई.कई जमानो हो जद लोग चला'र आपरी पसंद वाळै कनै चाय पीवण जावता.कीं खास दुकानां माथै चाय री भगौली चडीयोड़ी'ज रैवती.लोग कठै रा कठै सूं आवता.जद उण दिनां री याद आइ तो मैं निरे टैम पछे चाय रो मूड उठै जा अर पीवण रो बणायो. मिनखां ने ले जावती गाडियां री भीड़ सूं बच-बचावतो उठै पुगो तो काईं देखूं कै थडी तो उठै'ज है पर आदमी दूजो बैठो है. मैं उन्नै पूछियो के पैली वाला भाई साब कठै ? तो जवाब आयो कै भाई साब पागथी जूस रो काम संभाळै. मतलब कै भाई साब सेठ बण ग्या है. चोखो भई चोखो, नीतर चाय री थडीयां ने ऊठते टैम नी लागे. जगै जगै मॉल बण रया है. माल सूं ठसा ठस भरियोडा. कई ठा इत्तो माल किण रै वास्ते राखै. रोजीना नवो नवो माल दिखे. दूजी कानै किराणा रा छोटा दुकानदार अखबार हाथ में लेर पंखो झलता इज दिखे.टैम इज टैम लागै वांरे कनै.
मैं समझ सकूं के परदेस माँय आपरी मायड़ भासा में पढ़ण रो कईं आनंद होया करै.मां बोलती सुणीजै ज्यूं. थन्नै जाण अर अचरज होवैला कै अबार एक जलसे में अठै रा लूंठा साहित्यकार डा.आइदान सिंह भाटी री हिंदी कवितावां में राजस्थानी रा ठेठ सब्दां माथै सवाल खडा होय ग्या.भाटी जी कयो कै जद हिंदी में भोजपुरी या कै खड़ी बोली रा सब्दां माथै कदी सवाल नी हुआ तो राजस्थानी रो प्रयोग क्यूं अखरै? अर दुनिया रा महान साहित्यकारां आपरी मायड़ बोली री महिमा करी है तो हाल ताई इण तरै रा सवाल क्यूं उठै ?मूमल नै आप खड़ी बोली में सुण'र वैड़ो आनंद ले सको? पाबूजी री पड़ भोजपुरी में बांच सको? अठै भासा रो सवाल इज सई नी है.बात किण री नै कठे री हो रई है वा जरूरी है.सब्द तो यूँ भी रमता जोगी हुआ करै. कठै कठै सूं आ अर बिराज जावै. आ अर भासा संस्कृति रा वाहक हुआ करै.
बात भी ठीक है.वडा पाव में लांबी मिर्च घुसा अर उन्नै मिर्ची बड़ो कै सकां? जठैरी बात होय री है वठै रा सब्द इज ओपै. अर जै मारी बात थने ओपती लागै तो याद करतो रईजै. मैं जाणू थारे कनै टैम रो टोटो है.सब जगा आईज हाल है. अबै करां राम राम.
कैवण री बात कोनी कै अठे बत्ती गर्मी पड़ण लागगी है. सैन होवण सूं बार रो मामलो हो रयो है.इण बिच्चे लारले दो दिनां सूं आंधी चाल री है.ऊपर सूं तो गर्मी बरसतोड़ी नी दिखे पर जमीन सूं झाळ वैड़ी री वैड़ी है. डूबतोड़े सूरज ने आज मैं आंधी रै माँय देखियो. धूडै सूं भरिज्योड़ो. शैतान बच्चे रे ज्यूं कैव्तो के अबार तो जावण रो टैम है, काल पाछो आ'र बताऊंला, इण सूं बत्ती गर्मी ले'र आउंला. मारवाड़ में इण मौसम में गर्मी री कईं बात करणी. अठै जोधपुर में प्रसासन एक काम चोखो करयो. स्कूलां में टाबरां रै जल्दी छुट्टी रा आदेश जारी कर दीना.कई ठा डर भी हो सकै कै कठै तबीयत दूजी ख़राब होयगी तो जवाब देणो भरी पड़ जावैला.
स्कूलां सूं याद आयो कै थारी भतीजी रो एडमीसन चोखी भणाई- पढाई वाळी स्कूल में होय ग्यो है. मन्नै सब बधाई अर थारी भतीजी ने आसीस दे रिया है. स्कूल में हिंदी पढावण वाळा बैन्जी जद निप वाळो पैन लावन रो आदेस फरमायो तो मैं बौत राजी व्हियो.मारै बाळपणै री याद ताजी होयगी. काइ चालतो वा पैन ! माखण वै ज्यूं. राइटिंग जोरदार जमती.आ बात दूजी है कै कंप्यूटर माथै लिखण रै जमाने में आज राइटिंग नै कुण पूछै. खैर थूं सुणा. कीकर चाल री है गाडी?
घणा टैम पछै एकर जालोरी गेट वाळी चाय री थडी याद आई.कई जमानो हो जद लोग चला'र आपरी पसंद वाळै कनै चाय पीवण जावता.कीं खास दुकानां माथै चाय री भगौली चडीयोड़ी'ज रैवती.लोग कठै रा कठै सूं आवता.जद उण दिनां री याद आइ तो मैं निरे टैम पछे चाय रो मूड उठै जा अर पीवण रो बणायो. मिनखां ने ले जावती गाडियां री भीड़ सूं बच-बचावतो उठै पुगो तो काईं देखूं कै थडी तो उठै'ज है पर आदमी दूजो बैठो है. मैं उन्नै पूछियो के पैली वाला भाई साब कठै ? तो जवाब आयो कै भाई साब पागथी जूस रो काम संभाळै. मतलब कै भाई साब सेठ बण ग्या है. चोखो भई चोखो, नीतर चाय री थडीयां ने ऊठते टैम नी लागे. जगै जगै मॉल बण रया है. माल सूं ठसा ठस भरियोडा. कई ठा इत्तो माल किण रै वास्ते राखै. रोजीना नवो नवो माल दिखे. दूजी कानै किराणा रा छोटा दुकानदार अखबार हाथ में लेर पंखो झलता इज दिखे.टैम इज टैम लागै वांरे कनै.
मैं समझ सकूं के परदेस माँय आपरी मायड़ भासा में पढ़ण रो कईं आनंद होया करै.मां बोलती सुणीजै ज्यूं. थन्नै जाण अर अचरज होवैला कै अबार एक जलसे में अठै रा लूंठा साहित्यकार डा.आइदान सिंह भाटी री हिंदी कवितावां में राजस्थानी रा ठेठ सब्दां माथै सवाल खडा होय ग्या.भाटी जी कयो कै जद हिंदी में भोजपुरी या कै खड़ी बोली रा सब्दां माथै कदी सवाल नी हुआ तो राजस्थानी रो प्रयोग क्यूं अखरै? अर दुनिया रा महान साहित्यकारां आपरी मायड़ बोली री महिमा करी है तो हाल ताई इण तरै रा सवाल क्यूं उठै ?मूमल नै आप खड़ी बोली में सुण'र वैड़ो आनंद ले सको? पाबूजी री पड़ भोजपुरी में बांच सको? अठै भासा रो सवाल इज सई नी है.बात किण री नै कठे री हो रई है वा जरूरी है.सब्द तो यूँ भी रमता जोगी हुआ करै. कठै कठै सूं आ अर बिराज जावै. आ अर भासा संस्कृति रा वाहक हुआ करै.
बात भी ठीक है.वडा पाव में लांबी मिर्च घुसा अर उन्नै मिर्ची बड़ो कै सकां? जठैरी बात होय री है वठै रा सब्द इज ओपै. अर जै मारी बात थने ओपती लागै तो याद करतो रईजै. मैं जाणू थारे कनै टैम रो टोटो है.सब जगा आईज हाल है. अबै करां राम राम.
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